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राजनीतिज्ञों, पीने के पानी की चिंता करो | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। हमारे भारत के पक्ष-प्रतिपक्ष के चिन्तन में पीने के पानी की प्राथमिकता नहीं है | उनके चिन्तन के क्षेत्र अलहदा है, इसके विपरीत पीने का पानी सबकी, पहली जरूरत है | किसी को इस विषय पर सोचने की फुर्सत नहीं है | कांग्रेस का चिन्तन इन दिनों मोदी सरकार है और मोदी सरकार का चिन्तन कांग्रेस है | वाम दलों का भी इससे इतर कोई सोच नहीं | यह बात सारे राजनीतिग्य भूल रहे हैं कि कम होने पर पानी कोई बना नहीं सकेगा, लेकिन अगर बचाने के उपाय हो गये तो जीवन बचाया जा सकेगा |

आप भी जान लीजिये कि हमारा देश भयावह जल संकट की ओर बढ़ रहा है| सरकार द्वारा संसद को हाल ही में दी गयी जानकारी के मुताबिक, 2121 तक जल उपलब्धता औसतन प्रति व्यक्ति 1486 घन मीटर रह जायेगी, जो 2001 और 2011 में क्रमशः 1816 और 1575 घन मीटर थी| पानी की कमी और बाढ़ व सूखे के खतरे के आधार पर हुए एक ताज़ा अध्ययन में वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट ने 189 देशों की सूची में भारत को ऊपर 13 वें स्थान पर रखा है| अर्थ साफ़ है पानी का संकट आएगा | आप हम भी कुछ कर सकते हैं,सब सरकार करे यह संभव है भी और नहीं भी है| यहाँ तो पक्ष-प्रतिपक्ष की प्राथमिकता एक दूसरे को नीचा दिखाने की है | जल समस्या जैसी समस्या के समाधान खोजने में नहीं है |

यह सब जानते है और आप भी जान लीजिये कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण सूखे और बाढ़ की बारंबारता की आशंकाएं भी बढ़ती जा रही हैं| हमारा भारत उन देशों में शामिल है, जो खेती, उद्योग और रोजमर्रा की औसतन 80 प्रतिशत जरूरत जमीन पर और उसके भीतर उपलब्ध पानी से पूरी करते हैं| नदियों और जलाशयों के समुचित रख-रखाव के अभाव में तथा उनके अतिक्रमण के कारण भी समस्या बढ़ रही है| सारे प्रयासों के बावजूद हम बेहद मामूली मात्रा में बारिश के पानी का संरक्षण कर पाते हैं| कुछ सालों से मॉनसून बेढब प्रकार का रहा है, जिससे सूखे और पानी की कमी की स्थिति पैदा होती जा रही है|

पूरे देश की तुलना में यह संकट उत्तर भारत में बहुत गंभीर रहा है, परंतु इस वर्ष पश्चिमी और दक्षिणी भारत में भी सूखे का चिंताजनक असर देखा गया है| पिछले साल नीति आयोग ने भी चेतावनी दी थी कि 2020 तक 21 बड़े शहरों में भूजल का स्तर शून्य तक पहुंच जायेगा| उल्लेखनीय है कि देश की 12 प्रतिशत आबादी को रोजाना नल का पानी नहीं मिल पाता है | अनेक इलाकों में उन्हें दूर-दूर से पानी लाना पड़ता है या फिर लंबी कतारें लगाकर काम भर पानी लेना पड़ता है| इसे शुद्ध पेयजल बनाने के लिए परम्परागत ज्ञान या विज्ञान की रासायनिक क्रिया की मदद लेनी होती है| क्या यह दुःख की बात नहीं है कि पूरे देश को शुद्ध पेयजल प्रदाय करना या करवाना पक्ष और प्रतिपक्ष के अजेंडे में. नहीं है |

इसी धींगामस्ती के कारण अधिकांश आबादी प्रदूषित पानी का सेवन करने के लिए मजबूर है| इन तथ्यों व आंकड़ों के साथ इस संभावना को रख कर देखें कि आगामी एक दशक में पानी की मांग उपलब्ध मात्रा से दुगुनी हो जायेगी| कहने को भारत सरकार ने पानी के संरक्षण और नल से पेयजल पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना बनायी है, इसमें ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गयी है| इसकी निगहबानी कौन करे राजनेताओं को फुर्सत नहीं है स्वच्छ भारत, शौचालय निर्माण और संक्रामक रोगों की रोकथाम के आंकड़े आ जाते है पर इन पहलों से पानी बचाने में कितनी मदद मिली या नहीं इसका कोई मूल्यांकन न तो सरकार के पास है और न ही प्रतिपक्ष की चिंता का विषय ही है |

कहने को जलशक्ति मंत्रालय के तहत व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर जोर दिया जा रहा है, जिससे 2024 तक सभी घरों में नल के माध्यम से पानी उपलब्ध कराया जा सके| लेकिन पानी बचाने और वर्षाजल को संग्रहित करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया तो पानी ही नहीं होगा, तो नलों की क्या उपयोगिता रह जायेगी| 

आंकड़े कहते है देश को हर साल तीन हजार अरब घन मीटर पानी की जरूरत होती है, जबकि बारिश की मात्रा ही चार हजार अरब घन मीटर है|जरूरी है इसके संग्रहण के लिए जलाशयों व नदियों को बचाना और भूजल के स्तर को बढ़ानेवाली जगहों को ठीक करना होगा| घरों में भी संग्रहण तथा पानी के सीमित और समुचित उपयोग के लिए जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर देना होगा जिसमे हम सबको लगना होगा |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क 9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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