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भोपाल, जिसका अब कोई नहीं ! | EDITORIAL by Rakesh Dubey

भोपाल। भोपाल भी अजीब शहर होता जा रहा है, जिसे कोई अपनाने को तैयार नहीं है | किसी को अगले 50 बरस के भोपाल से सरोकार नहीं है | अपने को “बर्रुकाट भोपाली” कहने वालों के वारिस भी शहर से जरूरतपूरता सरोकार रखे हुए हैं |तालाब तलैयों और पहाड़ियों से जिसकी पहचान थी | जिसके कुएं बावड़ी शान कहे जाते थे | उसके तालाबों में मकान दुकान उग आये हैं | पहाड़ियों पर बसाहट हो रही है, 50 से 70 साल के उम्रदराज पेड़ काटे जा रहे है | हद तो यह है कि यह पेड़ स्मार्ट सिटी और विधायक विश्राम गृह बनाने के लिए काटे गये और काटे जा रहे हैं | इस ‘पर्यावरण विध्वंस” को इस सरकार अर्थात कांग्रेस सरकार की अनुमति है, ओ पिछली भाजपा सरकार का भी आशीर्वाद था | जिन नागरिकों की दम पर प्रजातंत्र का ताजिया खड़ा होता है, उनकी कोई पूछ-परख नहीं है | लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जीते-हारे नेताओं ने भी ऐसे आँखें मूंद रखी हैं, जैसे चुनाव ही उनका जीवन-मरण था | अब उनका इस शहर से कोई,मतलब या वास्ता नहीं है |

कुछ सरकारी छोटे- बड़े सेवा निवृत अधिकारी अपना सरोकार किसी भी कारण से भोपाल से जोड़ने की कोशिश भी कर रहे तो उनके तर्कों का मखौल उड़ाया जा रहा है| लक्ष्मी नारायण गिरी पर बिडला ट्रस्ट द्वारा मन्दिर बनाते समय, पेड़ के बदले में लगाये गये पौधे अब पेड़ बन गये हैं जिन्हें काट दिया गया है और कटाई निरंतर जारी है | यहाँ विधायक विश्रामगृह बनना है| माननीय अध्यक्ष विधानसभा यदि विधायकों के संरक्षक है, इस शहर के प्रति भी उनका कुछ दायित्व है| पिछली सरकार की खींची लकीर पर चलना तर्क हो सकता है, विवेक पूर्ण, प्रकृति संरक्षण सम्मत निर्णय नहीं| उम्मीद है एक बार विचार करेंगे |

भोपाल में कुछ हारे जीते नेता पडौस के जिलों से आये हैं, पर उन मंत्री महोदय और विधायक जी की इस सब पर चुप्पी आश्चर्यजनक है, जो इस शहर में ही पैदा हुए हैं | उन्हें तो शहर में हो रहे इन “पर्यावरण विध्वंस” पर दलगत राजनीति छोड़ कर एकजुट होना चाहिए | स्मार्ट सिटी के नाम पर हजारों पेड़ों की क़ुरबानी हो गई है | सबसे ताज़ा बात यह है कि भोपाल का सबसे व्यस्त न्यू मार्किट में प्रवेश दीवाली के अवसर पर माता मन्दिर की ओर से बंद रहा | दूकानदार स्मार्ट सिटी की परियोजना को कोस रहे थे | 

भोपाल के साथ ये सारा बर्ताव किसी और ने भोपालियों ने ही किया है | भोपाल के निवासियों ने किसी अच्छे कदम की सराहना ही नहीं की | विवाद जरुर किया है | भोपाल के बड़े-छोटे तालाबों को देखकर कोई भी कह देता है कि यह जल संकट कभी नहीं होगा | ऐसा नहीं है यदि ज्यादा बारिश के कारण भदभदा और पातरा से पानी नहीं बहे तो तालाब का पानी किसी काम का नहीं रहे | भोपाल नगर निगम आधे शहर को नर्मदा का पानी देती है तो आधे शहर में यह पानी उपलब्ध नहीं है | कोलार बांध से पानी लाकर पुराने शहर में पूर्ति होती है लेकिन कोलार रोड पर बसी कालोनियों में गर्मी त्राहिमाम त्राहिमाम करते गुजरती है | सच में भोपालियों ने भोपाल के विकास से सरोकार नहीं रखा | हर प्रकार की नागरिक सुविधा और चिंता को खांचे में बांटते रहे अब भी इससे गुरेज नहीं है | भोपाल अब भी मिसाल बन सकता है | बस थोड़े अहम और थोड़े वहम को तिलांजली देकर अपने- परायों की सराहना करना सीख जाये, खांचों से निकल कर |

कल एक और बड़ा काम हुआ जिस पर सारा भोपाल चुप है | पूर्व राष्ट्रपति और भोपाल के नाम को रोशन करने वाले डॉ शकंर दयाल शर्मा का स्मरण एक बड़े अखबार के न्यूज पोर्टल ने इस तरह किया “डॉ शंकर दयाल शर्मा के शिक्षा मंत्री के कार्यकाल में ग से गणेश की जगह, ग से गधा पढ़ाया जाने लगा | यह कैसा स्मरण है ? भोपाल के लोग चुप है| सरोकार का सवाल है, उस शहर की हर बात से सरोकार होना चाहिए जहाँ आप रहते हैं | आप किसी भी पद पर हो सकते हैं, मंत्री, विधायक, अफसर, व्यपारी साँस लेने के लिए प्राणवायु पहला सरोकार है | यदि हाँ. तो नजर घुमाईये. सीमेंट कंक्रीट का जंगल आपके आसपास कहाँ उग रहा है ?
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क 9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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