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1.25 लाख अध्यापकों को 2000 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान हो गया

भोपाल। मध्य प्रदेश में कार्यरत लगभग आधे अध्यापकों को गलत वेतन भुगतान हो रहा है। यह उनके लिए सुनिश्चित वेतन से अधिक है। एक शिकायत में दावा किया गया है कि शिक्षाकर्मी और संविदा शिक्षक से अध्यापक संवर्ग में संविलियन के बाद आए करीब 1.25 लाख अध्यापकों की क्रमोन्नति के दौरान वेतन निर्धारण फार्मूला गलत लग गया और इस तरह अब तक 2000 करोड़ रुपए का गलत भुगतान हो गया। अब सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि इसकी वसूली कैसे की जाए। 

1998 से 2003 तक भर्ती सभी अध्यपकों का समान वेतन हो गया

दरअसल, 1998 में नियुक्त शिक्षाकर्मी 2010 में क्रमोन्नत होकर अध्यापक बने, लेकिन वेतनमान की गणना आदेश में उसे अध्यापक का वेतनमान देने के लिए सेवा अवधि गणना 2007 से कर दी। तब वह सहायक अध्यापक थे। ऐसी ही गलती 2001 और 2003 में नियुक्त संविदा शिक्षकों की क्रमोन्नति में हुई है। इन कर्मियों को क्रमश: 2013 व 2015 में क्रमोन्नत वेतनमान दिया गया, लेकिन वित्तीय लाभ देने के लिए सेवा अवधि की गणना 2007 की तारीख से कर दी। इस आदेश में क्रमोन्नत और पदोन्नत अध्यापकों का वेतन निर्धारित करने की तारीख में गड़बड़ी हुई। इस तकनीकी त्रुटि के कारण 1998, 2001 और 2003 में नियुक्त सभी कर्मियों का वेतन निर्धारण एक जैसा हो गया। ज्यादा भुगतान के आंकड़े का विश्लेषण किया जाए तो वर्ष 2016 से अब तक राज्य सरकार दो हजार करोड़ सुपए से अधिक का भुगतान अध्यापकों को कर चुकी है।

1998 से 2003 तक सभी का वेतन निर्धारण 1 अप्रैल 2007 से कर दिया

वर्ष 1998, 2001 और 2003 में लगभग सवा लाख शिक्षाकर्मी नियुक्त हुए थे। सरकार ने इन्हें 12 साल की अवधि पर क्रमोन्नत और पदोन्नत वेतनमान स्वीकृत किया, लेकिन इनके वेतन निर्धारण की तारीख में चूक हो गई। मसलन 1998 में जो शिक्षाकर्मी बने थे, उन्हें 2010 की तारीख से पदोन्नत कर अध्यापक बनाया गया। साथ ही 2001 और 2003 वाले भी क्रमोन्नत कर दिए गए, पर अलग- अलग वर्षों में नियुक्त इन अध्यापकों को क्रमोन्नत वेतनमान की गणना 12 साल की अवधि पूरी करने के बाद से जाना थी, लेकिन सरकार ने सभी सेवा अवधि की गणना 1 अप्रैल 2007 की तारीख से मान ली और उसी आधार पर वेतनमान दे दिया। जबकि अध्यापकों की पदोन्नित क्रमश: 2010,2013 और 2015 में हुई। यानी उन्हें तब 1 अप्रैल 2007 की तारीख से क्रमोन्नत मान लिया, जब उनका संविलियन अध्यापक संवर्ग में हुआ था। उस तारीख पर वे क्रमोन्नत नहीं हुए थे। क्रमोन्नति का वर्ष तो 2010, 2013 और 2015है। क्रमोन्नत वेतनमान की गणना के लिए सेवा अवधि की गणना वर्ष से की जाना थी।

सरकार के आदेश में चूक थी

दरअसल, सरकार ने क्रमोन्नत वेतनमान के लिए सरकार ने एक संशोधन आदेश निकाला और कहा कि इनकी सेवा अवधि की गणना 1 अप्रैल 2007 से की जाए। इसमें ही चूक ये हुई कि जो 2010, 2013 व 2015 में क्रमोन्नत हुए। छठे वेतनमान निर्धारण में सभी की सेवा अवधि एक समान (आठ साल) मान ली गई। इससे जो छह साल पहले क्रमोन्नत हुए थे और जो एक साल पहले क्रमोन्नत हुए, सभी को एक जैसा वेतनमान दे दिया गया।

सरल तरीके से समझिए क्या हुआ है

जो शिक्षाकर्मी वर्ग 3 में 1998 में नियुक्त हुए वे 2010 में क्रमोन्नत होकर अध्यापक बने। 
2001 और 2003 वाले वर्ग 3 के संविदा शिक्षक 2013 और 2015 में अध्यापक बने। 
इन तीनों की सेवा अवधि सरकार ने 1 अप्रैल 2007 मान ली। 
इसी आधार पर अध्यापक पद का वेतन निधारण कर दिया। 
जबकि 1 अप्रैल 2007 को तो ये सभी सहायक अध्यापक पद पर कार्यरत थे। 

कई आदेश निकाले, हर आदेश में गलती

राज्य सरकार ने अध्यापक संवर्ग को एक जनवरी 2016 से छटा वेतनमान स्वीकृत किया था। छठे वेतनमान में निर्धारण के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने पहला आदेश 31 मई 2016 को निकाला, पर तकनीकी त्रुटि के कारण इसे निरस्त कर दिया गया। इसके बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास और नगरीय निकाय विभाग द्वारा दो-तीन बार आदेश निकाले गए, लेकिन हर बार किसी चूक के चलते उन्हें रद्द करना पड़ा। अंत में 7 जुलाई 2017 के आदेश के तहत अध्यापक संवर्ग को 6वां वेतनमान दिया गया।