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अधूरे तथ्यों के सहारे जन अभियान | EDITORIAL by Rakesh Dubey

मानसून अपने शवाब पर है | भारत की स्थानीय संस्थाओं के सफाई अभियानों की पोल खुल चुकी है| सरकार भले ही कितने इनाम दें ,हकीकत ज्यों की त्यों है | देश की राजधानियों में अव्वल रहने वाला भोपाल और देश में नम्बर एक का ख़िताब जीतने वाले  इंदौर की मानसून ने पोल खोल दी है | कारण, हम भारतीयों का व्यवहार अपरिवर्तनीय है | हम उस ढर्रे को छोडना नहीं चाहते जिस पर हम बरसों- बरस से कायम हैं | कोई भी अभियान  हमारे व्यवहार को बदल नहीं सका है |

वैसे भारत ने अनेक व्यवहार बदलने के अभियान देखे हैं। स्वच्छ भारत इनमें से अभियान है। इस अभियान के तहत देश भर में नौ करोड़ से अधिक शौचालय बनाये जाने का दावा हैं। बने भी होंगे, शौचालय निर्माण ज्यादा बड़ा मसला न तो तब था और न अब है । वास्तविक चुनौती, अब भी है लोगों को शौचालय के उपयोग के लिए प्रेरित करना। देश में सारे व्यवहारगत परिवर्तन के अन्य अभियानों की भी लगभग यही कहानी है। ऐसे अभियानों की शुरुआत बहुत अच्छी होती है, लेकिन वांछित परिणाम नहीं मिलते हैं। इस वर्ष का आर्थिक सर्वेक्षण भी लोगों की पसंद बदलने के लिए उनके मनोविज्ञान की अंतर्दृष्टि के उपयोग पर जोर देता है।

मानव मस्तिष्क यथास्थिति पसंद करता है, इसलिए व्यवहारगत परिवर्तन कठिन होते हैं। भारत विविधता से भरा विशाल देश है| यहाँ आदतों को बदलना  टेढ़ी खीर है। सदियों से भारतीयों ने अनेक मजबूत विश्वास और अभ्यास विकसित कर रखे हैं। उदाहरण के लिए, प्रार्थना से पहले जल से स्वयं को साफ करना भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। अनेक वास्तुशास्त्रीय सलाहों के बावजूद  भारतीय आज भी अपनी रसोई के पास शौच करते हुए बहुत असहज अनुभव करते हैं। यह धारणा सिकुड़ती जमीन और बसाहट में शौचालयों के निर्माण में एक बाधा है।  शौचालय और आज के शौचालय जिसमें जल का प्रयोग सर्वाधिक है, अब इसे बदलने की बात चली है | प्रश्न यह है विकल्प क्या ? पानी की उपलब्धता दिन ब दिन  कम होती जा रही है |भूजल संग्रह हो नहीं रहा है | वैसे भी देश में स्वच्छता के प्रति जो मानसिक बुनावट है, वह हजारों साल पुरानी है, जबकि सफाई में कीटाणु आधारित दृष्टिकोण एक सदी पुराना भी नहीं है। बदलने के लिए गहरी सांस्कृतिक जड़ों में जाना पड़ेगा। वर्गभेद भारतीय समाज का अभिन्न पहलू है। लोग सोचते हैं कि वे व्यवहारगत बदलाव भी वर्ग व्यवस्था के हिसाब से ही करेंगे।

भारत में कई अन्य आदतें हैं, जिनकी यही दशा है। गलत व्यवहार करने वालों से तुलना करें, तो अच्छा व्यवहार करने वाले अल्पसंख्यक हैं। अनेक मामलों में गलत व्यवहार सामाजिक रिवाज है और बहुसंख्यकों के व्यवहार का अनुसरण करना सामान्य मानव प्रवृत्ति है। व्यवहारगत परिवर्तन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पहला कदम होगा, यथोचित मूलभूत ढांचा मुहैया कराना। लेकिन कुछ मामले ऐसे भी हैं, जहां नया मूलभूत ढांचा भी नई व्यवहारगत समस्याएं पैदा कर रहा है। जैसे  आगामी जल संकट और शौचालय अभियान | भारत में व्यवहारगत बदलावों में सबसे बड़ी बाधा तो स्वयं सरकार है। 

सरकार ही मुख्य बदलाव कर्ता है, लेकिन उसका लोगों से पर्याप्त भावनात्मक जुड़ाव नहीं है। बहुत से नागरिक सरकार से धोखे को गलत नहीं मानते, क्योंकि वे भ्रष्टों से धोखा करने को न्यायोचित ठहराते हैं। यह आश्चर्यजनक है कि अनेक नागरिक राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं से मजबूत भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं, लेकिन जब वही नेता सरकार में शामिल हो जाते हैं, तो उनके व्यवहारगत उपदेशों के आगे सबके कान बहरे हो जाते हैं। किसी भी अभियान के पहले यदि सारे पहलुओं पर ध्यान दिया जायेगा, तो अभियान की सफलता में संदेह नहीं रहेगा और वांछित परिणाम मिलेंगे |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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