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चिकित्सा सेवा और मध्यप्रदेश | EDITORIAL by Rakesh Dubey

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी धर्म बेटी के निधन पर ढाढे फाड़-फाड़ कर रोये | समय पर इलाज न मिलने से उनकी बेटी की मौत हो गई थी | मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के सुल्तानिया, हमीदिया और जे पी अस्पताल ऐसी कहानियाँ रोज सुनने को मिलती है | या तो डाक्टर मौजूद नहीं होते, मौजूद होते हैं तो अस्पताल की जगह नर्सिंग होम का रास्ता दिखा कर वहां इलाज  करते  हैं |यह राजधानी की दशा है, मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपनी ऊँगली का इलाज कराने के लिए दिल्ली से डाक्टर बुलाना पड़ा था | सरकार भले ही कितना दावा करे प्रदेश में डाक्टर और जनसंख्या अनुपात कभी नहीं सुधरेगा | वैसे अभी प्रदेश के १६,६९६ नागरिकों पर एक डाक्टर उपलब्ध है | देश में १०,१८९ नागरिकों पर एक डाक्टर उपलब्ध होने का अनुमान है |राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल, २०१८ के मुताबिक सबसे बेहतर स्थिति दिल्ली में है, जहां २२०३  लोगों के लिए एक डॉक्टर है| सबसे चिंताजनक स्थिति बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में है| देश के ९५ प्रतिशत से अधिक केंद्रों में कार्यरत लोगों की संख्या पांच से कम है| इस हालत में गरीब और कम आयवाले मरीज समय पर जांच और सही इलाज नहीं करा पाते हैं. 

देश में करीब प्रतिशत मौतों का संबंध बीमारियों से है| कुपोषण, प्रदूषण, अशिक्षा आदि की वजह से स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और चिंताजनक हो जाती हैं| देश में करीब ११  लाख पंजीकृत और हर साल निकलनेवाले ५०  हजार नये डॉक्टरों की संख्या के बावजूद चिकित्सकों की बड़ी कमी बेहद आश्चर्यजनक है| इसका हिसाब लगाया जाना चाहिए कि डिग्री व पंजीकरण के बाद भी ये डॉक्टर कहां जाते हैं? इसके साथ ही शासकीय अस्पतालों में मौजूद डाक्टर कम क्यों नहीं करते | भोपाल के गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय से सम्बन्धित हमीदिया और सुल्तानिया अस्पतालों में वर्षों से कई रसूखदार डाक्टर जमे हैं | प्रायवेट प्रेक्टिस के लिए मरीज जुटाने के ये अस्पताल बड़े श्रोत हैं | बहाना सरकार का बजट न होना और दवाओं का अभाव है |यह सही है स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की भी जरूरत है| अभी  स्वास्थ्य पर जीडीपी का लगभग सवा फीसदी खर्च के साथ भारत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे पीछे है| 

केंद्रीय बजट में और राज्य सरकारें इस मद में आवंटन में लगातार बढ़ोतरी कर रही हैं, फिर भी इलाज का ६२ प्रतिशत  खर्च लोगों को अपनी जेब से भरना पड़ता है| सरकार भी मानती है कि ७५  लाख परिवार इलाज के बढ़ते खर्च के कारण गरीबी के शिकार हो जाते हैं. इन चुनौतियों का सामना करने के लिए केंद्रीय व राज्य सरकारों की योजनाओं और उपलब्ध संसाधनों में तालमेल बनाने की जरूरत है| 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण का प्रस्ताव स्वागतयोग्य है| प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने पिछले कार्यकाल में विविध उद्देश्यों को समायोजित कर नीतिगत और व्यावहारिक पहल की ठोस शुरुआत कर दी है| चिकित्सा शिक्षा में हो रहे सुधारों की कोशिशों के साथ चिकित्सकों की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है|  अपनी सुरक्षा की मांग करने वाले चिकित्सक अपने काम के प्रति सरकारी अस्पताल में सजग नहीं होते | नर्सिंग होम में उनकी सजगता देखते ही बनती है | अब सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों का वेतन और सुविधाएँ कम नहीं है | समाज उनकी सुरक्षा में तब खड़ा हो सकता है जब वे पदनाम के अनुरूप व्यवहार करें | वे डाक्टर सा व्यवहार नहीं करते, उनके व्यवहार में सेवा नहीं उपकार का भाव होता है | समाज सरकार का निर्माता है, सरकार को समाज का ध्यान रखना है और समाज को शासकीय सेवकों का | भले ही वो सेवक डाक्टर ही क्यों न हो |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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