अपनेपन के साथ सत्ता चलाने वाले शिवराज सिंह चौहान को क्यों नकारा गया, यहां पढ़िए | MP NEWS

13 December 2018

वीरेन्द्र विश्‍वकर्मा / भोपाल। 9893364130| बीते डेढ़ दशक से भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने मप्र को कई योजनाएं दीं। इसमें कोई शक नहीं है कि लोगों को इन योजनाओं से फायदा भी मिला है। प्रतिभावान बच्चों के कॉलेज ( COLLEGE ) की फीस भरना हो या फिर प्रसूता को सहायता राशि देना हो या फिर गरीबों को दो सौ रूपए प्रति माह बिजली मुहैया कराना हो। ये ऐसी योजनाएं हैं जो आमजनों के लिए बेहद उपयोगी साबित हुई हैं। इसके बाद भी मध्य प्रदेश के मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। 

चापलूस अफसर और घमंडी नेताओं को परखने में गच्चा खा गए SHIVRAJ 

जहां तक राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सवाल है तो इतना सभ्य शालीन और विनम्र मुख्यमंत्री शायद ही कभी मप्र को मिला हो। जिसने कभी मुख्यमंत्री बनकर काम नहीं किया है। यही कारण है कि जब भाजपा विधानसभा चुनाव हारी तो उन्होंने बड़ी ही शालीनता से कह दिया कि इसके लिए कोई और नहीं मैं खुद जिम्मेदार हूं। प्रत्येक वर्ग का ख्याल रखते हुए अपनेपन के साथ सत्ता चलाने वाले चौहान को क्यों नकारा गया? इसके तमाम कारणों में एक सबसे बड़ा कारण यही है कि चापलूस अफसरों और कुछ घमंडी भाजपाईयों के कारण वे गच्चा खा गए। 

भावांतर योजना ने नाराज किसान को गुस्सा दिला दिया /Bhavantar Yojana gave an angry farmer angry

जहां तक मुझे लगता है कि चूक सत्ता चलाने में नहीं हुई है। बल्कि एक ऐसी गलती चौहान कर गए जिससे वे खुद अनभिज्ञ रहे। सबसे पहले तो उन्होंने ऐसे अफसरों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया जो मुख्यमंत्री को लगातार गुमराह करते रहे। अपनी वॉक चातुर्यता से शिवराज सिंह चौहान को भरोसा दिलाते रहे कि जो भी वे कर रहे हैं उससे राज्य की जनता बेहद खुश होगी। इसका सबसे बेहतर और सटीक उदाहरण भावांतर योजना रही है। किसान लगातार इस योजना का विरोध करता रहा। विरोध प्रदर्शन के बाद भी चौहान ने उसकी समीक्षा खुद के विवेक से नहीं की। जिससे किसानों में नाराजगी बढ़ती गई और भाजपा के खिलाफ एक हवा बनना शुरू हो गई। ठीक इसी तरह का हाल किसानों को मुआवजा वितरण और फसल बीमा का भी हुआ। हालांकि भावांतर को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता अनूप मिश्रा सहित करीब आधा दर्जन कबिना मंत्रियों और नेताओं ने सरकार को चेताने की कोशिश की, लेकिन चापलूस अफसरों के कारण उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया। 

पार्टी के नेताओं ने बताया था परंतु SHIVRAJ SINGH सुन नहीं पाए

यहां तक कि अनूप मिश्रा ने अक्टूबर 2017 में कृषि विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजौरा को पत्र लिखकर कहा है कि ‘भावांतर योजना के क्रियान्वयन में ऐसा नहीं दिख रहा है कि यह शिवराज सरकार का किसान हितैषी निर्णय है। जिस तरह से इस योजना को लागू किया गया है, उससे किसान अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। यह योजना वल्लभ भवन में बैठ कर बनाई गई है। अब आप मंडियों में पहुंचकर फीडबैक लें। किसानों और व्यापारियों के बीच बैठकर चर्चा करें या फिर मैं मंडियों में जाऊं, यह आपको तय करना है। अन्यथा आपका विभाग मुख्यमंत्री की छवि को गंभीर क्षति पहुंचा सकता है जो मुझे मंजूर नहीं होगा’। 

किसानों को 50 हजार रुपए नकद देने का बयान परेशानी पैदा कर गया


भावांतर की खामियों का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि मुख्यमंत्री ने कह दिया था कि किसानों को 50 हजार रुपए नकद दिए जाएंगे लेकिन व्यापारी आयकर विभाग की गाइड लाइन का हवाला देकर 10 हजार रुपए से ज्यादा नहीं दे पाए। ऐसे में क्या आयकर अधिनियम की जानकारी अफसरों को नहीं थी? यदि नियम मालूम नहीं था तो ये बड़ा दुर्भाग्य है और नियम पता था तो क्या मुख्यमंत्री की छवि बिगाड़ने के लिए उनसे 50 हजार रूपए नगद भुगतान कराने को कहलवाया गया? जो भी हो पर इतना जरूर है कि इससे किसानों नाराजगी बढ़ी और सत्ता की मुखालफत होने लगी। इसके बाद रही सही कसर भाजपा के उन नेताओं ने पूरी कर दी जो खुद को भगवान समझ बैठे थे। जो कई बार कहते सुने गए कि हम आपके वोट से नहीं जीते तो कई बार यहां तक कह दिया कि कमल के फूल पर कुत्ता भी खड़ा हो जाएगा तो चुनाव जीत जाएगा। इतनी अकड़ और घंमड आज के समय में कौन बर्दाश्त करेगा। इसी घमंड के चलते राज्य की करीब दो दर्जन विधानसभा सीटों पर सिटिंग एमएलए का जबरदस्त विरोध हुआ। भारी विरोध के बाद भी पार्टी ने इन्ही लोगों का टिकट दे दिया। 

अफसरों पर शिकंजा कसा होता तो आज तस्वीर कुछ अलग ही होती


इनमें अधिकांशत: वो लोग थे जो पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समर्थक माने जाते हैं। मतलब साफ है कि शालीनता और विनम्रता पर भरोसा करने वाले चौहान के इर्द-गिर्द घूमने वाले कई घमंडी और अकड़ से लबालब नेताओं का स्वभाव, चौहान के स्वभाव के ठीक विपरीत रहा। जब ऐसे नेताओं के संबंध में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जानकारी दी गई और उन्हें बुलाकर उनसे पूछा गया तो उन्होंने अपने व्यवहार को बेहद शालीन बताकर आरोपों को नकार दिया। जिस पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भरोसा कर लिया और कभी क्षेत्र में जाकर या जमीनी कार्यकर्ताओं से गुप्त रूप से हकीकत जानने की कोशिश नहीं की। जिसका खामियाजा शिवराज सिंह चौहान को सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा। यदि वास्तव में ऐसे अकड़ेले नेताओं और चापलूस अफसरों की पैंतरेबाजी चौहान ने समझ ली होती तो शायद ये दिन नहीं देखने पड़ते। ऐसे लोगों को कार्रवाई और अफसरों पर शिकंजा कसा होता तो आज तस्वीर कुछ अलग ही होती। 

उनके अपनों की कथित करतूतों को लोगों ने नजर अंदाज नहीं किया

यदि विधानसभा चुनाव के परिणामों की बात करें तो भाजपा को ओवरआल कांग्रेस से करीब 47 हजार 827 वोट ज्यादा मिले है लेकिन सीटें सिर्फ 109 ही मिलीं। जबकि कांग्रेस ने 114 सीटें जीतकर सत्ता हासिल करने में कामयाबी हासिल की है। ज्यादा वोट मिलने का मतलब है कि राज्य की जनता आज भी मामाजी को जी जान से चाहती है। और उन्हें वोट देने वालों की तादाद ज्यादा है। जहां तक सवाल युवाओं का है तो जितनी नौकरीं भाजपा सरकार ने दीं है इसके पहले कभी नहीं हुई है। वो बात अलग है कि व्यापमं, डंपर, सिहंस्थ जैसे कई मामले आए है, लेकिन इन सबसे कोई खास प्रभाव नहीं हुआ। यदि कहीं कोई आरोप आया भी है तो सीधे तौर से चौहान को प्रभावित नहीं किया है। लेकिन उनके इर्द-गिर्द घूम रहे भाजपा के कार्यकर्ता या फिर उनके अपने रिश्तेदारों की कथित करतूतों को लोगों ने नजर अंदाज नहीं किया है। चाहे अवैध रेत खनन का मामला हो या फिर अपनों को ऑब्लाईज करने की बात हो। 

बागियों ने बड़ा नुक्सान पहुंचाया

इसके अलावा भाजपा की बागी नेताओं की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है। राज्य में कई भाजपा के नेता ऐसे थे जो टिकट नहीं मिलने से नाराज थे और उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत के समीकरण को तहस नहस कर दिया। पूर्व कृषि मंत्री डॉ. रामकृष्ण कुसमारिया ( Agriculture Minister Dr. Ramkrishna Kusmariya ) और ग्वालियर की पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता ( MAYOR SAMIKSHA GUPTA ) की वजह से तीन सीटें भाजपा नहीं जीत पायी जो संभवत: भाजपा के खाते में जा सकती थी। निर्दलीयों ने चार लाख से ज्यादा वोट हासिल कर भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई है।

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