“राजा” की वापिसी का अंदेशा,’महाराजा’ के सर चिंता की लकीरें | EDITORIAL by Rakesh Dubey

21 November 2018

यूँ तो 28 नवम्बर को मध्यप्रदेश के मतदाता यह फैसला करेंगे कि अगले 5 साल प्रदेश के शासन की बागडोर किसके हाथों में होगी। कल प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से उड़ी हवा “राजा” अर्थात दिग्विजय सिंह की वापिसी की बात कह रही है। सवाल दिग्विजय की वापिसी कांग्रेस की वापिसी क्यों नहीं ? प्रदेश में कांग्रेस के शेष गुट मान बैठे हैं, लड़ाई कठिन है और टिकटों की जमावट मीडिया मेनेजमेंट में दिग्विजय सिंह का पलड़ा भारी है। यह भी खबर है कि दिग्विजय ने दिल्ली को अपेक्षित परिणाम और रणनीति के तहत अपने लौटने के संकेत दे दिए हैं। इन संकेतों ने दिग्विजय समर्थकों में उत्साह फूंक दिया है तो दूसरे खेमों सिंधिया और कमलनाथ खेमों के कार्यकर्ताओं के माथे पर बल पड़ने लगे हैं।

चुनाव की रणभेरी बजने के पहले कमलनाथ दिग्विजय के दस साल के कार्यकाल को कोस चुके हैं, अब अरुण यादव भी इसी राग को अलाप रहे हैं। हकीकत यह है कांग्रेस भाजपा के 15 साल के शासनकाल की जमकर आलोचना तो करती है लेकिन जैसे ही दिग्विजय सिंह के 10 साल के शासनकाल की बात आती है तो कोई जवाब नहीं दे पाती है। बुधनी में शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ कांग्रेसी उम्मीदवार अरुण यादव ने बातों-बातों में कह ही दिया कि उसी कार्यकाल का ख़ामियाजा पार्टी पिछले 15 सालों से भुगत रही है।

सिंधिया परिवार की राजनीति और सदस्यों की आपसी तुलना ज्योतिरादित्य सिंधिया की धाक को कम कर रही है। एक वक़्त था जब यह परिवार ग्वालियर इलाक़े में कम से कम 50 विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करता था, लेकिन अब ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने लोकसभा क्षेत्र गुना में ही विधानसभा की कुल चार सीटों पर जीत नहीं दिलवा पाते हैं। ग्वालियर शहर में इस परिवार की कोई आलोचना नहीं करता है, लेकिन ग्वालियर शहर से बाहर कई लोग इस चीज़ को रेखांकित करते हैं कि माधव राव सिंधिया वाली बात ज्योतिरादित्य सिंधिया में नहीं है।

मध्यप्रदेश बनने के बाद सिंधिया परिवार का दखल दोनों प्रमुख दलों में रहा। आज भाजपा की प्रेरणास्रोत “राजमाता” और माधव राव कांग्रेस और तत्समय के जनसंघ में आये- गये हैं। आज भी परिवार एक हिस्सा इधर तो एक हिस्सा उधर है। आज़ाद भारत में सिंधिया परिवार का राजनीतिक संबंध कांग्रेस और भाजपा [ तत्समय जनसंघ ] दोनों से रहा। राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ से चुनाव भी लड़ीं, तो कांग्रेस में भी गई। 1950 के दशक में ग्वालियर में हिन्दू महासभा की मज़बूत मौजूदगी थी। तब हिन्दू महासभा को महाराजा जीवाजीराव ने भी संरक्षण दिया था।

इन दिनों ग्वालियर घराने का सारा इतिहास सुनियोजित तरीके से मीडिया में बखाना जा रहा है। इसका राहुल गाँधी की पसंदगी और कुछ लोगों से उनकी नपसंदगी है। टिकटों के वितरण में बड़ी हिस्सेदारी और अपेक्षित परिणाम के अनुमान से “राजा” अपने निर्णय और वादे से मुकर भी सकते हैं। अभी “मीडियामंडन” भी इसी दिशा में हो रहा है। कोई भी लौटे जनता ने 25 बरस जो भोगा है, उससे मुक्ति मिले और कुछ नई बयार प्रदेश को मिले, तो जनता को चैन आये।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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