ये बंद, धैर्य और राष्ट्रधर्म | EDITORIAL by Rakesh Dubey

06 September 2018

आज का भारतबंद नेतृत्व विहीन है। कोई व्यक्ति या दल खुले रूप में सामने नहीं है, परोक्ष में सारे राजनीतिक दल हैं। यह बंद शांतिपूर्ण हो, इस कामना के साथ आज़ादी के बाद से चली आरही कुछ समस्याओं का निदान भी इसमें नजर आता है। संयम के साथ विचार की जरूरत है। समान नागरिक संहिता आशापुंज है। फ़िलहाल आज के आन्दोलन के पीछे कौन है से ज्यादा विचार का बिंदु समाधान का प्रयास हैं। एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में रखने के लिए संसद में विधेयक लाए जाने के बावजूद प्रतिपक्षी खेमे ने राजनीतिक लाभ लेने के मकसद से इस बात को हवा दी कि भारतीय जनता पार्टी दलित विरोधी है, यह प्रचार अभी थमा नहीं है और  प्रतिपक्ष दूसरे पाले में जा खड़ा हुआ है। दो अप्रैल को भारत बंद में हुई व्यापक हिंसा को  भी प्रतिपक्षी दलों ने भुनाने की कोशिश की थी। यह विचार जरूरी है, कि असहमति और आन्दोलन की सीमा क्या हो ?

अप्रेल आन्दोलन के चंद महीने के भीतर इसकी प्रतिक्रिया में सवर्ण संगठनों ने इस बंद का आयोजन किया है। विचार का विषय है इस समय अंतराल में इस कानून से समाज को क्या लाभ और क्या नुकसान हुआ? लगभग सभी दलों को ये आभास हो चुका है कि इस पर ज्यादा जोर देना नुकसान का सौदा साबित हो सकता है। खास कर उन  राज्यों में जहां की राजनीति ओबीसी और ईबीसी के ईर्द-गिर्द घूमती है और और एक बड़े प्रतिशत के  वोट बैंक के साथ ये सत्ता की चाबी अपने पास रखने का दावा करते हैं। आज का यह नेतृत्व विहीन आन्दोलन ऐसे विभाजनकारी  तत्वों की ठेकेदारी को ख़ारिज करता है।

एससी-एसटी नेताओं के तर्कों बीच सवर्ण आरक्षण पर एनडीए में ही मतभेद दिखाई देता है। मतभेद की यह दरार ऊपर से नीचे तक साफ़ दिखती है। आज़ादी के बाद से सामजिक समरसता के नाम पर तुष्टीकरण और वोट बैंक बनाने और बिगाड़ने का जो खेल शुरू हुआ उसकी यह परिणति साफ़ दिख रही है। अब भी चुनाव की वेला में इसका लाभ लेने को आतुर राजनीतिक दल इसके भावी नुकसान को नहीं आंक रहे है। यदि आर्थिक गरीबी के आधार पर सवर्णों को आरक्षण मिलता है, तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है। गरीबी सबके लिए समान है, इससे पार पाने के लिए संघर्ष जरूरी है पर इसके स्थान पर जातीय मुद्दों को गर्म करना, समाधान को लम्बित रखना, राष्ट्रहित से ऊपर स्वहित को महत्व देना तो राष्ट्रधर्म का निर्वाह नहीं है। भारत के लोकतंत्र में असहमति का भी सम्मान करने की परम्परा है, सारे पक्षों पर विचार जरूरी है, धैर्य के साथ। यह धैर्य ही तो राष्ट्रधर्म का पहला पायदान है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
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