प्रिय बहनो, इस बार अपने भाईयों से इस लड़ाई में योगदान का वचन जरूर लेना | KHULA KHAT by SAPAKS

25 August 2018

प्रिय सपाक्स बहनों, रक्षा बन्धन के पवित्र त्योहार के अवसर पर सपाक्स समाज संस्था एवं संस्था की महिला ईकाई की ओर से स्नेह भरा अभिवादन। राजनीतिक दलों की वोट बैंक के लिए तुष्टिकरण व अवसरवादी राजनीति के कारण हमारे समाज की पहले से ही निरंतर उपेक्षा होती रही है जो आजकल चरम पर है जातिगत आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण व सरकारी नौकरियों में बैकलाग व्यवस्था से जहाँ एक ओर हमारे प्रतिभाशाली बच्चों को भी सरकारी नौकरी में आने से रोका जा रहा है वहीं दूसरी ओर दलितों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में न्यूनतम प्राप्तांको की अनिवार्यता समाप्त कर सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता नष्ट की जा रही है।

तुष्टिकरण की पराकाष्ठा तो यह है कि पटवारी व शिक्षक के रूप नियुक्ति में जाति विशेष के लिए बीएड/डीएड और पीजीडीसीए की अनिवार्यता समाप्त किए जाने की घोषणाएं हो रही हैं। कहा जा रहा है कि यह योग्यता नौकरी में चयन होने के बाद संबन्धितो द्वारा प्राप्त कर ली जाएगी। यदि हम मौन रहकर यह सब सहते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब चिकित्सक, अभियन्ता, जज व इसी तरह की अन्य महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए भी घोषणा कर दी जाएगी कि चिकित्सक इलाज करते हुए, अभियन्ता पुल भवन बनाते हुए और जज फैसले देते हुए उचित योग्यताएं हासिल कर लेंगे।

दूसरा मुद्दा और भी डरावना है। दलित उत्पीड़न एक्ट के संबंध में यह सर्वविदित है कि कैसे प्रतिशोध की भावना से  दलित एक्ट के झूठे मुकदमों में फंसाकर पूरे परिवार को तबाह कर दिया जाता है। इस एक्ट में झूठे मामलों की भरमार देखकर ही देश के सर्वोच्च न्यायालय ने  मौलिक व मानवाधिकारो को बचाने के लिए यह फैसला दिया था कि बगैर पर्याप्त जांच/ सबूतों के किसी भी निरपराध को गिरफ्तार न किया जावे। सरकारी कर्मचारियों के मामले में यह बंधन रखा गया कि मुकदमा दर्ज करने के पहले नियुक्तिकर्ता अधिकारी से अनुमति लेनी होगी लेकिन केन्द्र सरकार ने दलित सांसदों के दबाव व वोट बैंक की लालच में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट कर इसे और कड़ा कर दिया है। अब शिकायत मिलते ही आरोपी की गिरफ्तारी व फैसला होने तक जेल में बंद रखा जाएगा।

प्रदेश में महिलाओं से निरंतर बढ़ रहे अत्याचार और अपराधों पर प्रभावी अंकुश में सरकार की निष्फलता स्वत: महिलाओं के प्रति सरकार की संवेदनहीनता बताती है। सरकार की कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट है। शासन से कानून के राज्य की अपेक्षा होती है न कि निरर्थक बहलाने की बातों की। किसी महिला को मान मुख्यमंत्री घोषणा उपरांत उसकी जायज मांग पर जेल भिजवा दें, यह निंदनीय है। महिला उत्पीडन रोकने हेतु सकारात्मक पहल की बजाय सरकार स्वयं उस राह पर चले, यह समर्थन योग्य नहीं है। 

प्रिय बहनों, दोगली राजनीति ने सामान्य पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों से उनके मौलिक व मानवाधिकार छीन कर दोयम दर्जे का नागरिक मान लिया है। सरकार के लिए हमारी उपयोगिता हमारी कमाई में 30% टैक्स 28% जीएसटी और 300-400% मंहगा पेट्रोल डीजल पर कर वसूली तक ही सीमित रह गई है।

अतः आपसे अनुरोध है कि अपने अपने भाईयों की कलाई में राखी बांधते समय उनसे जातिगत आरक्षण और दलित उत्पीड़न एक्ट की मुसीबत से समाज को छुटकारा दिलाने की लड़ाई में आगे आने का वचन अवश्य लें।
प्रवक्ता
सापाक़्स समाज संस्था
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