यह “इंटरनेट कर्फ्यू” | EDITORIAL by Rakesh Dubey

26 August 2018

भारत में संचार क्रांति से जहाँ अनेक सुविधाएँ हुई हैं, वही इसके नुकसान भी कम नहीं है। वीडियो के चलते युवाओं द्वारा आत्महत्या के मामले तो सामने आये ही हैं। इस संचार क्रांति के कारण इंटरनेट के माध्यम से नकल के नित नए तरीके सामने आने लगे हैं। आए दिन नकल गिरोह गिरफ्तार किये जा रहे हैं, इससे भी इस समस्या के विकराल स्वरूप को समझा जा सकता है।

निष्पक्ष परीक्षाएं कराना प्रशासन का दायित्व है, इससे को इंकार नहीं कर सकता। इससे जुडा सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इस दायित्व के निर्वहन में क्षेत्र विशेष की इंटरनेट सेवा बंद आम नागरिक के अधिकारों का हनन किया जा सकता है? प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक इंटरनेट बंद होने के मामले सामने आ रहे हैं। इंटरनेट कानून व्यवस्था की दृष्टि बंद करना समझ में आता है। आये दिन परीक्षा के नाम पर इंटरनेट बंद करना, सही नहीं है। संचार क्रांति के इस दौर में हर व्यक्ति के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल दैनिक आवश्यकता हो गई है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मोबाइल पर इंटरनेट सुविधा के लिए भुगतान करता है। इस सुविधा से उसे जब तक वंचित नहीं किया जा सकता जब तक कि वह भुगतान में डिफॉल्टर न हो। पिछले दिनों से यह देखा जा रहा है कि जिन शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन होता है वहां प्रशासनिक आदेश मात्र से ‘इंटरनेट कर्फ्यू ’ लगा दिया जाता है। इस प्रकार के आदेश को जनहित में कतई नहीं माना जा सकता। परीक्षा में नकल की रोकथाम के नाम पर सम्पूर्ण शहर को इस तरह से ‘लकवाग्रस्त’ करना कहीं से भी तो न्यायोचित नहीं है।

इस विषय को लेकर मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों के संगठन ‘सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसियेशन ऑफ इंडिया’ ने पिछले दिनों भारत सरकार के दूरसंचार मंत्रालय को भी पत्र लिखा है। पत्र में इस बात पर चिंता जताई गई है कि राज्य सरकारें इंटरनेट को अस्थायी बाधित करने की प्रवृत्ति को बढ़ा रही है। खास तौर से उन प्रदेशों के बारे में कहा गया है कि सरकार ने पहले गृह सचिव को ही प्राप्त शक्तियों को  जिला कलेक्टर व पुलिस अधीक्षकों को हस्तांतरित कर दिया है जिससे वे  अब कभी भी इंटरनेट सुविधा पर अस्थायी रोक लगा देते  हैं। कारण परीक्षा का बताया जाता है, प्रत्येक रविवार को परीक्षाएं आयोजित होती है और शहर का इंटरनेट बंद।

किसी निश्चित अवधि तक इंटरनेट बंद करने के आदेश स्वेच्छाचारी होने के कारण संविधान के अनुच्छेद 14 के प्रतिकूल है। यह आम नागरिक के दैनिक जीवन को प्रभावित कर अनुच्छेद 21  का भी उल्लंघन करता है। परीक्षा केन्द्रों पर जेमर लगा इंटरनेट का सीमित इस्तेमाल इस समस्या का समाधान जरूर हो सकता है। सरकार को परीक्षाएं निरापद कराना है, तो रास्ते उसे ही खोजना होंगे। सारी परीक्षाएं ऑन लाईन कराने पर भी विचार किया जा सकता है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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