भीड़ की हिंसा और लेटलतीफी | EDITORIAL by Rakesh Dubey

23 July 2018

अलवर में भीड़ द्वारा की गई हिंसा ने कुछ सवाल खड़े किये हैं। उनमे से प्रमुख सवाल राज्य सरकारों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की राय को गंभीरता से न लेना है। सच तो यह है भीड़ की हिंसा के मामलों पर न तो केवल चिंता जताने से बात बनने वाली है और न ही सोशल मीडिया पर दोष मढ़ने से। केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह भीड़ की हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगाने में अपनी प्रभावी सक्रियता का परिचय दे। नि:संदेह कानून एवं व्यवस्था राज्यों का विषय होने के नाते यह देखना मूलत: राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि भीड़ की हिंसा के मामले थमें। केंद्र सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्यों का पुलिस प्रशासन इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सजगता का परिचय दे।सर्वोच्च न्यायलय के निर्देश के बाद इस मामले में काम शुरू हो जाना था।

देश के करीब 20 राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। अच्छा यह होगा कि केंद्र सरकार इसके लिए समुचित कदम उठाए कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों की ओर से शासित राज्य उन दिशा-निर्देशों पर अमल अवश्य करें, जो सुप्रीम कोर्ट की ओर से हाल ही में दिए गए हैं। इन दिशा-निर्देशों की वैसी अनदेखी नहीं होनी चाहिए, जैसी पुलिस सुधार संबंधी दिशा-निर्देशों की हुई थी। यदि पुलिस सुधार संबंधी दिशा-निर्देशों पर समय रहते अमल हो जाता तो आज शायद भीड़ की हिंसा के मामले राष्ट्रीय चिंता का विषय नहीं बने होते। यह ठीक नहीं कि केंद्र सरकार के पास भीड़ के हाथों मारे गए लोगों का कोई आंकड़ा ही नहीं है। कम से कम अब तो यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) भीड़ की हिंसा के मामलों का विवरण रखे। ऐसा कोई विवरण समस्या के कारणों की पहचान करने में सहायक बनेगा।

भीड़ की हिंसा एक ऐसा अपराध है, जो अलग-अलग कारणों से अंजाम दिया जाता है। कभी भीड़ अनायास उग्र होकर हिंसा पर आमादा हो जाती है तो कभी उसे सुनियोजित तरीके से भड़काया जाता है। इसी तरह कभी मामूली वाद-विवाद भीड़ को हिंसक बना देता है तो कभी किसी बड़ी घ्ाटना के बाद लोगों का उग्र समूह अराजकता के रास्ते पर चल निकलता है। अक्सर ऐसी अराजकता में राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल होते हैं। इधर किस्म-किस्म के स्वयंभू संगठन भी बेलगाम हो रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि अक्सर ऐसे संगठनों को किसी न किसी राजनीतिक दल का खुला-छिपा समर्थन हासिल होता है। कई बार अफवाह के चलते भी भीड़ का हिंसक और बर्बर रूप देखने को मिलता है। भारत में भीड़ की हिंसा एक पुरानी समस्या है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उससे निपटने के नए उपाय न किए जाएं। भीड़ की हिंसा के खिलाफ सख्ती की जरूरत है और इस जरूरत की पूर्ति हर हाल में होनी चाहिए।

केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया सेवा प्रदाताओं को फर्जी खबरों और अफवाहों पर रोक लगाने का तंत्र बनाने को कहा है, परन्तु यह कदम नाकाफी है। सबसे पहले उस मानसिकता को भी दूर करने की जरूरत है, जिसके चलते लोग कानून हाथ में लेने को तैयार रहते हैं। वे ऐसा इसलिए भी करते हैं, क्योंकि उन्हें बच निकलने की पूरी उम्मीद होती है। ऐसी उम्मीद के लिए कानून एवं व्यवस्था का लचर तंत्र और मजबूत राजनीतिक तन्त्र दोषी है। मजबूत राजनीतिक विचार को कमजोर और कमजोर व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
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