स्कूल शिक्षा और सरकार | EDITORIAL by Rakesh Dubey

16 July 2018

एक सर्वे के अनुसार आज देश के 65 प्रतिशत लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं, इससे 3-4 दशक पहले भी भेजते थे। पहले वे खुशी-खुशी भेजते थे, अब मजबूरी में भेजते हैं, क्योंकि वे यह मानते हैं कि सरकारी स्कूल अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा नहीं दे पाते हैं और निजी स्कूल की फ़ीस देना उनकी कुव्वत में शामिल नहीं  है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की फीस देना अधिकांश परिवारों के लिए संभव नहीं है। बेहतर शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है और इसे सब अच्छी तरह समझते भी हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहना होगा कि इसके बाद  सरकारी तंत्र स्कूल आज भी जनमानस में अपनी साख बना नहीं पाया है।

सरकार का यह मानना गलत है किसरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार केवल नई योजनाओं अथवा सरकारी अधिकारियों की संख्या बढ़ाकर किया जा सकता है। सबसे पहले प्राचीन भारत की परंपरा के तहत शिक्षा [ज्ञान] प्राप्ति के चार तत्वों को समझाना चाहिए। ये चार तत्व हैं-अध्ययन, मनन, चिंतन और उपयोग। उस ज्ञान का कोई महत्व नहीं जिसके उपयोग के संबंध में सिखाने वाला ही अनभिज्ञ हो। इसी तरह उस शिक्षा का कोई उपयोग नहीं है जो व्यक्ति की मनन और चिंतन शक्ति को प्रखरता न प्रदान करे। जिस शोध एवं नवाचार में सर्वजन कल्याण का लक्ष्य निहित न हो वह केवल लाभांश कमाने के लिए उठाया गया कदम बन कर रह जाता है। सर्वभूत हिते रत: की परंपरा वाली प्राचीन भारत की संस्कृति से अपरिचित व्यक्ति ही केवल अपने संबंध में सोचेगा।

एक बड़ा कारण और है ,सेक्युलरिज्म के नाम पर नई पीढ़ी को शिक्षा प्राप्ति के दौरान प्राचीन भारतीय संस्कृति से अपरिचित रखना। प्रत्येक देश शिक्षा में गतिशीलता बनाए रखने के लिए लगातार प्रयत्नशील रहता है। वह नए को स्वीकार करता है मगर अपनी संस्कृति से संबंध भी बनाए रखता है। भारत में फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली को लागू करने का सपना देखने के स्थान पर हमें चीन के व्यावहारिकता से भरे क्रियान्वयन से सबक लेना चाहिए, जहां स्कूली शिक्षा में समुदाय और सरकार, दोनों की भागीदारी तय है।

प्रारंभिक शिक्षा नि:शुल्क प्रदान करना सरकारों का उत्तरदायित्व है मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं कि समाज इसकी सफलता की चिंता न करे। यह एक तथ्य है कि अपने देश में सामाजिक सहयोग के अभाव में अनेक प्रयास असफल हो गए हैं। पंचायतों को अध्यापक नियुक्त करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का दुरुपयोग हो रहा है। अधिकांश नियुक्तियां पक्षपात और भ्रष्टाचार की कहानी कह रही हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आम लोगों ने अपना सामाजिक और सामूहिक उत्तरदायित्व नहीं निभाया। यदि कोई राज्य सरकार किसी विभाग में 22 हजार सरकारी नियुक्तियों में से 18 हजार पर एक ही जाति के लोगों को नियुक्त करे तो इसका असर सब पर पड़ेगा। इसका दुष्परिणाम देश के भविष्य पर भी पड़ेगा। जब राज्यों के लोक सेवा  आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियों को न्यायपालिका कई बार निरस्त करे तो युवा पीढ़ी का व्यवस्था पर विश्वास डगमगाता है और चारों ओर निराशा हताशा फैलती है।

सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को मुख्य रूप से सरकारी स्कूलों की गिरती साख के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है मगर यह भुला दिया जाता है कि वे किन कठिन परिस्थितियों में कार्य करते है? पहला स्थानान्तरण- शिक्षा अधिकारी अध्यापकों के स्थानांतरण के लिए अनुचित  राशि लेने के लिए बदनाम हो तो सरकारी स्कूलों में सुधार कैसे संभव होंगे? सम्मान -हाल में एक मुख्यमंत्री ने अपने व्यवहार से यह स्पष्ट किया कि इस देश में राजनेता अध्यापकों का कितना सम्मान करते हैं? यह हर राज्य की कहानी है। अब किसी को ऐसे प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है कि जिला या ब्लाक स्तर पर अध्यापकों से कैसा व्यवहार किया जाता है? सुधार संभव है यदि नेता और नौकरशाह अपने कर्तव्य ढंग से निभाएं। यदि किसी क्षेत्र के विधायक और सांसद अपनी जन निष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते हों और वे शिक्षा सुधार में रुचि लेते हों तो सरकारी अधिकारी कोई दुस्साहस नहीं कर पाएंगे। जो देश अपनी शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता न देता हो और जो अपने अध्यापकों पर भरोसा न करता हो वह सुनहरे भविष्य की संकल्पना केवल सपनों में ही कर सकता है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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