सरकार के खिलाफ अफसर और अफसर के खिलाफ सरकार | EDITORIAL

Tuesday, June 12, 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। दिल्ली में सरकार के खिलाफ अफसर और अफसरों के खिलाफ सरकार आन्दोलन कर रही है। हाथ से फिसलती नौकरशाही का यह चरम है। देश की राजनीति में न समझ आने वाले व्यक्तित्व अरविन्द केजरीवाल फिर धरने पर हैं। इस बार में वे उन अफसरों के खिलाफ धरने पर है जो उनके यानि दिल्ली सरकार के मातहत हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल के घर अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ धरने पर बैठने के पहले भाजपा को सशर्त समर्थन देने की बात भी कही। लगता है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इन दिनों फिर से एक्शन मोड में लौट आए हैं। एक ओर तो उन्होंने विधानसभा में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने पर 2019 में बीजेपी को समर्थन की बात कह डाली। दूसरी ओर अफसरों के काम करने के ढंग को लेकर उपराज्यपाल से मिलने गए केजरीवाल अपने तीन मंत्रियों के साथ उपराज्यपाल के वेटिंग रूम में ही हड़ताल पर बैठे हुए हैं।

दरअसल पूरी दिल्ली सरकार और उसका मंत्रिमंडल अफसरों की हड़ताल से हलकान है। देश में वैसे भी एक नया चलन चल गया है अब अफसर सिर्फ उन्ही कामों को करते हैं, जिनमें उनकी रूचि हो। राजनीतिक सम्प्रभुओं के हाथ से कमान निकलती जा रही है। मध्यप्रदेश और राजस्थान इसके उदहारण है। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के आदेशों पर अमल न होना आम बात हो गई है। इन सरकारों की मजबूरी है, किसके खिलाफ धरना दें। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह किसानों के मामले को लेकर एक बार उपवास पर बैठ चुके हैं। किसानों की समस्या वही की वही हैं। नियन्त्रण विहीन होती कार्यपालिका का उदहारण छतीसगढ़ में भी सुनने को आते हैं।

अब प्रश्न यह है कि अफसरशाही बेलगाम क्यों हो रही है ? राज्यों में अब अफसरों में राजनीतिक सम्प्रभुओं की अवहेलना क्यों हो रही है ? इसका कोई उपाय है। अफसरों की पदस्थी के नियमों को ताक में रखने, मनचाहे अधिकारियों से अपेक्षित और अनापेक्षित कार्य कराने से अफसरशाही बेलगाम होती है। जिन-जिन राज्यों में प्रशासनिक अफसरों को मन चाहे तरीके से पदस्थ किया गया है, वही ऐसी शिकायते ज्यादा होती हैं। तबादलों की नीति अब इतनी लचीली और जुगाडू हो गई है की यह अस्त्र अब बौना हो गया है। दिल्ली में तो इसकी गुंजाइश और कम है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के वे अधिकारी जो इस राजनीतिक प्रपंच से दूर रहना चाहते थे अपनी सेवाएं केंद्र को देना मुनासिब समझते है। इस नीति के तहत कई अफसर केंद्र में तैनात है और कई जाने की कगार पर हैं।

प्रधानमंत्री बार-बार प्रशासनिक सुधार की बात करते हैं। कुछ अफसरों पर नाकामी का ठप्पा लगाकर, उन्हें वे कार्यमुक्त कर चुके हैं। उन्हें इस राजनीतिक धींगामस्ती पर भी नियन्त्रण करना चाहिए। मनचाहे अफसर की मनचाही पदस्थी, मनचाही पदोन्नति और मनचाही सेवावृद्धि पर नियन्त्रण जरूरी है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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