हर किसी को बहू-बेटी की चिंता–समाधान ? | EDITORIAL

Monday, April 16, 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। देश में सब तरफ बलात्कार और हत्या की खबरें फैली हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पर चिंता जाहिर की है। देश में रेडियो मिर्ची चलता है। उसके आर जे नवेद का एक आडियो चर्चित है। जिसमें  नवेद एक गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. से फोन पर यह कहता है कि उसकी वाइफ प्रेग्नेंट है और उसे पता है कि उसे लडकी ही होनेवाली है, वह उसका एबॉर्शन करवाना चाहता है। उसे डर है कि उसकी लड़की का रेप हो जायेगा। वह बहुत सारे उदाहरण देकर बतलाता है कि दिल्ली में आठ महीने की बच्ची का रेप हो जाता है, कहीं 6 साल की बच्ची तो कही आठ साल की बच्ची का सामूहिक बलात्कार हो जाता है। बलात्कार के बाद उसकी निर्मम हत्या कर दी जाती है। 

देश के अख़बार और टीवी इन्ही प्रकार के समाचारों से भरे हैं। लड़कियां या महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं, न घर में, न खेत में, न बाजार में, न ऑफिस में, न थाने में, न न्यायालय में, न मंदिर में, न ही मस्जिद में। आखिर कहाँ जा रहे हैं हम सब? पाशविकता से भी बहुत आगे शायद राक्षस प्रवृत्ति पैदा हो गयी है, आज के पुरुषों में। अभी ताजा ताजा मामला कश्मीर के कठुआ और यू पी के उन्नाव का है, ये दोनों नाम तो बहुचर्चित हैं, इसलिए…. मीडिया में और राजनीति में भी हलचल है। इसके अलावा भी अनगिनत ऐसे मामले हैं जिनकी चर्चा तक नहीं है। थाने में प्राथमिकी तक दर्ज नही होती, लोकलाज के भय से लोग मामले को दबा देने में ही भलाई समझते हैं| समाज कहाँ जा रहा है ?

भाजपा सांसद हेमा मालिनी ने कठुआ और उन्नाव रेप केस में आखिर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए दोषियों को फांसी देने की मांग की है और कहा है कि ऐसे मामलों में मीडिया के समर्थन के साथ राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन होने चाहिये। उन्होंने कहा कि “इन जानवरों के खिलाफ, जो बच्चों और मासूमों को भी नहीं छोड़ते, मीडिया के जबरदस्त समर्थन के साथ राष्ट्रीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन होना चाहिए… मैं मेनका जी (मेनका गांधी) से सहमत हूं कि दोषी साबित होने पर तत्काल मौत की सजा दी जान चाहिए और सभी दुष्कर्मो (नाबालिग) के लिए कोई जमानत या माफी नहीं मिलनी चाहिए। दूसरी और कश्मीर में भाजपा के दो मंत्रियों चौधरी लाल सिंह और चंद्र प्रकाश गंगा इस्तीफा देकर दुष्कर्म और हत्या मामले के आरोपियों के समर्थन में निकाली गई रैली में शामिल होते हैं। कहीं कोई राजनीतिक मार्गदर्शन नहीं।

आखिर कब रुकेगा महिलाओं और बेटियों पर जुल्म! इस पाशविक वृत्ति में कब कमी आयेगी? क्या मनोवैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में सामाजिक मुद्दों पर बहस करने वाले, कोई स्थाई समाधान खोज पायेंगे ? हर क्षेत्र में पुरुषों से कन्धा से कन्धा मिलाकर काम कर रही नारी को उनकी स्वतंत्रता और भय के वातावरण से मुक्ति मिल सकेगी ? महिला और बच्चियों की सुरक्षा के लिए हर वर्ग को साथ आना चाहिए।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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