दक्षिण का द्वार और चुनावी अश्व | EDITORIAL

08 March 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। भाजपा में भारी जोश  में है और मोदी व शाह की जोड़ी इस जोश के सहारे दक्षिण भारत में अपने चुनावी अश्व को ले जाने को उतारू है। दक्षिण का द्वार खुलते ही उसका विजयी रथ बहुत सी संभावनाओं के द्वार खोलेगा। राजस्थान और मध्यप्रदेश के उप चुनावों में मिली हार से इन राज्यों में तौले जा विधानसभा परिणामों के आकलन भी पलट सकते हैं। वैसे इन दोनों राज्यों में संघटन में बदलाव साफ दिख रहा है। समय की नजाकत और ठोस परिणाम भाजपा ने लक्ष्य निर्धारित किया है। इसकी बानगी के 23 मार्च के राज्य सभा चुनाव के बाद उन मंत्रियों की खाली  लोकसभा सीटों सीटों पर 2019 के चुनाव के सेमी फाइनल की तरह होगा। वर्तमान परिस्थिति में कर्नाटक चुनाव सबको अपने भुजदण्ड तौलने का मौका देगा। भाजपा की जीत दक्षिण का द्वार खोलेगी तो कांग्रेस की साख का बनना बिगड़ना भी यही से होगा।

‘कांग्रेस मुक्त कर्नाटक’ का मतलब कांग्रेस पर सबसे घातक प्रहार। यह आखिरी बड़ा राज्य है, जहां कांग्रेस सरकार बची है। स्वाभाविक रूप से कर्नाटक विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए अगला बड़ा अभियान बनने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य में चुनावी रैलियां शुरू कर चुके हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लिंगायत समुदाय को आगे कर हिंदू वोटों के धु्रवीकरण में जुटे हैं। पार्टी तटीय कर्नाटक से बड़ी कामयाबी की उम्मीद कर रही है। वैसे दक्षिण, दक्षिण-पूर्व व पूर्वोत्तर में लोकसभा की 216 सीटें हैं। 2014 में भाजपा को इनमें से महज 32 सीटें मिलीं। उसने पूर्वोत्तर की 25 में से आठ सीटें जीतीं, जिनमें से सात तो अकेले असम से मिली थीं। दक्षिण और पूर्व की 191 सीटों में से वह केवल 24 हासिल कर सकी और इनमें से भी 17 अकेले कर्नाटक से मिलीं। तमिलनाडु में भाजपा को शायद यह एहसास हो गया है कि उसके प्रयास किसी लक्ष्य तक नहीं पहुंच रहे हैं। हालांकि, त्रिपुरा में वाम मोर्चे को परास्त कर उसका हौसला जरूर बढ़ा है कि वह केरल में कमजोर वाम दल से नई ऊर्जा के साथ मोर्चा ले सकती है। 

वैसे भी कर्नाटक भाजपा के लिए कोई नया प्रदेश नहीं है। वह वहां २००८  से २०१३  तक वो यहाँ सरकार चला चुकी है। इस दौरान उसके तीन-तीन मुख्यमंत्री रहे, सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे और राज्य पार्टी में काफी सिर-फुटौव्वल भी देखने को मिली।लिंगायत जहां भाजपा में नेतृत्व की भूमिका में है, तो वहीं पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की पार्टी जेडी (एस) में वोक्कालिंगा अगुवा जाति है। मुख्यमंत्री ने लिंगायतों के एक धड़े की इस मांग का समर्थन कर उनमें दरार डालने की भी कोशिश की है कि उन्हें एक अलग धर्म की मान्यता मिलनी चाहिए।  मोदी और शाह ने यहाँ हमेशा अपने भीतर चुनावी जीत की भूख दिखाई है। इसके उलट कांग्रेस ने   कोई मजबूत इरादा नहीं दिखाया है। पूर्वोत्तर में तो कांग्रेस ने  लगभग आत्म-समर्पण ही कर दिया था। गुजरात के आधे-अधूरे विजय अभियान के बाद राहुल गांधी से उम्मीद थी कि वह सामने से नेतृत्व करेंगे, मगर वह परिदृश्य से नदारद हो जाते हैं।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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