मप्र भाजपा में मेनन की रौशनी से चमकने वाली दिए भी बुझेंगे

Updesh Awasthee
भोपाल। मप्र के अरविंद मेनन की यूं अचानक विदाई, केवल एक घटना नहीं बल्कि भाजपा में एक नए संघर्ष की शुरूआत है। वो वर्ग जो अब तक चुपचाप सबकुछ सहन कर रहा था, मुखर हो गया है। सबकुछ सिर्फ यहीं ठहरने वाला नहीं है। अब मप्र में मेनन की रौशनी से चमकने वाले दियों को भी बुझाया जाएगा। इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। 

ऐसे में माना जा रहा है कि मेनन के करीबी संभागों के संगठन मंत्रियों को बदला जा सकता है।संघ की मंशा है कि भाजपा के अहम पदों पर ऐसे लोग रहें, जिनकी छवि साफ सुथरी हो।संघ की ही पृष्ठभूमि से संगठन में आए कुछ पदाधिकारियों पर बेनामी संपत्ति जमा करने के भी आरोप हैं। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मेनन के जाने के बाद संगठन के अलावा मोर्चा और प्रकोष्ठों में होने वाली नियुक्तियों में ऐसे लोगों के नाम आगे आ सकते हैं, जो अभी तक उपेक्षित महसूस कर रहे थे।

सहस्रबुद्धे की भूमिका 
इस बदलाव में सबसे प्रमुख भूमिका प्रदेश प्रभारी विनय सहस्रबुद्धे की मानी जा रही है। सहस्रबुद्धे ने यह संकेत दे दिए हैं कि उन्हें कोई कमजोर समझने की गलती न करे। मेनन का विरोध पिछले दो-तीन वर्षों से हो रहा था मगर इस विरोध की आवाज सही जगह तक नहीं पहुंची।सहस्रबुद्धे ने पहले मेनन की कार्यप्रणाली और उनसे जुड़े विवादों की पड़ताल की। फिर इस विरोध को सही जगह तक पहुंचाया।

इनकी ताकत हो सकती है कम
मेनन कई निर्णयों के कारण विवाद में आए। मेनन ने जिस प्रकार सागर महापौर के लिए अभय दरे का चयन किया या सागर में राजा दुबे को जिलाध्यक्ष बनवाया, उससे स्थानीय नेता दुखी तो थे। अब इन नेताओं ने बदलाव की मांग बुलंद कर दी है।

मेनन के खास माने जाने वाले अजय प्रताप सिंह, अरविंद भदौरिया, विनोद गोटिया, सत्येंद्र भूषण सिंह, गोविंद आर्य, मनोरंजन मिश्रा, अमरमणि त्रिपाठी, पुष्पेंद्र प्रताप सिंह आदि नेताओं का कद कम किया जा सकता है। वहीं, सांसदों में गणेश सिंह, जनार्दन मिश्र और रीति पाठक मेनन के करीबी माने जाते हैं। इन सांसदों के साथ तपन भौमिक, विजेंद्र सिसोदिया और विनय दुबे की ताकत भी कम हो सकती है। भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष अमरदीप मौर्य और महिला मोर्चे की अध्यक्ष लता वानखेड़े के भी ज्यादा समय तक पदों पर रहने की संभावना कम ही है।

इनके बदलने की संभावना
इंदौर के संभागीय संगठन मंत्री शैलेन्द्र बरुआ, उज्जैन के राकेश डागोर, होशंगाबाद के जितेंद्र लटौरिया और ग्वालियर के प्रदीप जोशी प्रमुख हैं। संजीव कांकेर और विक्रम बुंदेला का प्रभाव भी कम हो सकता है।
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