राकेश दुबे@प्रतिदिन। बैंकों के एनपीए में सबसे बड़ा हिस्सा आम लोगों द्वारा लिये गए कर्ज का है. कहना एक दम गलत है , हकीकत इसके ठीक विपरीत है। आंकड़ों के अनुसार एनपीए का सबसे बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट कर्ज का है। आमतौर पर औद्योगिक विकास के नाम पर कॉरपोरेट जगत को विशेष सुविधा दी जाती है। नया कंपनी कानून 2013 में लाया गया था, जिसने साठ साल पुराने कानून की जगह ली है। इस कानून के मुताबिक नई कंपनी शुरू करने के लिए केवल एक-दो दिन का समय लगना चाहिए। पहले यह समय-सीमा नौ-दस दिनों की थी, जिसे मौजूदा समय में कम करके चार-पांच दिनों पर लाया गया है।
गौरतलब है कि बैंकों को भी कर्ज देने में समय-सीमा का पालन करना होता है, जो कॉरपोरेट कर्ज के मामले में भी लागू होता है। अमूमन कंपनियों को जल्द से जल्द कर्ज स्वीकृत करने के लिए बैंक अधिकारियों पर दबाव बनाया जाता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी कंपनियों की वित्तीय सेहत का सही परीक्षण नहीं हो पाता है, और कॉरपोरेट कर्ज एनपीए में तब्दील हो जाते हैं।
रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन कॉरपोरेट कर्ज के ऊंचे स्तर और उसे चुकाने संबंधी उद्योग जगत की क्षमता पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। रघुराम राजन का मानना है कि अधिकतर कंपनियों के मुनाफे में कमी आ रही है, जिससे उन्हें कर्ज की किस्त तथा ब्याज चुकाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ती चूक के कारण कारपोरेट जगत के ‘पुनर्गठित’ कर्ज की व्यापकता तथा एनपीए में लगातार इजाफा हो रहा है। रघुराम राजन के मुताबिक उद्योग जगत का करीब बीस प्रतिशत कर्ज डूबने के कगार पर है। बहुत सारी कंपनियों ने वित्तवर्ष 2014-15 में परिचालन-घाटा दर्ज किया या उनका परिचालन-लाभ बैंक-कर्ज अदा करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इन कंपनियों का परिचालन-मुनाफा ब्याज लागत या ब्याज कवरेज अनुपात एक प्रतिशत से कम होने के कारण वे बैंक कर्ज एवं किस्त की अदायगी नहीं कर सकते हैं।
पिछले वित्तवर्ष में सड़सठ कंपनियों के बहीखाते पर कुल 5.65 लाख करोड़ रुपए का बैंक-कर्ज दर्ज था, जो देश की शीर्ष 441 गैर-वित्तीय कंपनियों के कुल कर्ज का तकरीबन बीस प्रतिशत है। गौरतलब है कि इन सड़सठ कंपनियों में से अधिकांश की हैसियत मौजूदा समय में नकारात्मक हो चुकी है। इन कंपनियों की संख्या वित्तवर्ष 2014-15 में बढ़ कर सड़सठ हो गई, जो पिछले साल उनचास, तीन साल पहले उनतीस और वित्तवर्ष 2009-10 के अंत तक सोलह थी। यह आंकड़ा बीएसई 500 बीएसई मिडकैप और बीएसई स्मॉलकैप सूचकांकों में शामिल चुनिंदा कंपनियों के आंकड़ों पर आधारित है।
