इंदौर। मध्यप्रदेश के 27 जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में सरकार फेल हो गई है। सरकारी सिस्टम ने हाथ टेक दिए हैं। अब पूरा जिम्मा एक एनजीओ को थमा दिया है। यही नहीं यहां काम करने वाले डॉक्टरों को सरकारी डॉक्टरों के मुकाबले लगभग दोगुनी तनख्वाह भी मिलेगी। हाल ही में प्रदेश सरकार और एनजीओ के बीच करार भी हो गया है। गौरतलब है कि स्वास्थ्य सूचकांक की सालाना रिपोर्ट आने के बाद राज्य सरकार ने ये फैसला लिया है।
सूत्रों के मुताबिक रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदेश के 27 जिले डॉक्टरों की संख्या, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने में बेहद पिछड़े हुए हैं। खास बात यह है कि सरकार इन जिलों में सरकारी डॉक्टरों को भेजने में भी नाकाम रही है। जब स्वास्थ्य के बिगड़ते हालात से प्रदेश सरकार को फटकार लगी तो एनजीओ का हाथ थाम लिया।
दीपक फाउंडेशन बड़ौदा (गुजरात) के साथ हाल ही में सरकार ने करार किया है। एनजीओ इन जिलों में अपने डॉक्टर तैनात करेगा। इनकी तनख्वाह तकरीबन सवा लाख रुपए महीना होगी। सरकार ने इन जिलों को हाई फोकस जिले माना है। इनकी मॉनीटरिंग का जिम्मा स्वास्थ्य विभाग के संभागीय संयुक्त संचालक को दिया गया है।
अभी ये हैं हालात
इन जिलों में फिलहाल स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) और एनेस्थेटिस्ट की सबसे ज्यादा कमी है। यह दोनों विशेषज्ञ नहीं होने से सिजेरियन डिलेवरी नहीं हो पाती। गर्भवती महिला की हालत बिगड़ने पर उसे इंदौर या दाहोद लेकर जाना पड़ता है। कई बार महिला दम तोड़ देती है। यही हालात शिशु स्वास्थ्य के हैं। इन जगहों पर विशेषज्ञ मौजूद नहीं हैं।
जरूरत 15000 डॉक्टरों की, कार्यरत 3500
निजी को लाख-सवा लाख, सरकारी को 60 हजार
एक सरकारी डॉक्टर नौकरी में आता है तो शुरुआती दौर में उसे करीब 50 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता है। दूरस्थ और आदिवासी अंचल के अधिसूचित जिलों में जाने वाले डॉक्टरों को अनुबंध के तहत 60 हजार तक मिलता है। जबकि पीएसपी के जरिये चयनित डॉक्टर हैं तो उसे 41-42 हजार रुपए ही मिलते हैं। दूसरी तरफ एनजीओ से तैनात निजी डॉक्टरों को सरकार लाख-सवा लाख वेतन देने की तैयारी में है।
(मप्र चिकित्सा अधिकारी संघ के महासचिव डॉ. माधव हासानी के मुताबिक)
स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकार संवेदनशील नहीं
स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर प्रदेश सरकार संवेदनशील नहीं है। सरकारी डॉक्टर गांवों में भी काम कर सकते हैं, लेकिन सरकार पहले डॉक्टरों की समस्याओं पर खुलकर बात तो करे। सेवा शर्तों और वेतनमान में कई विसंगतियां हैं। पदोन्न्ति के अवसर नहीं हैं तो कैसे काम करेंगे। अब सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में देना चाहती है तो दे दे, हम क्या कर सकते हैं।
डॉ. ललित श्रीवास्तव, संरक्षक, मप्र चिकित्सा अधिकारी संघ

