मुंबई। पिता की अच्छी आय व देखभाल करने की क्षमता के बावजूद सात साल से कम उम्र के बच्चे की नैसर्गिक संरक्षक मां ही होती है। बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में इस बात को स्पष्ट किया है। न्यायमूर्ति रणजीत मोरे व न्यायमूर्ति राजेश केतकर की खंडपीठ ने पिता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। याचिका में पिता ने अपनी दो व चार साल की बेटियों को उसे सौपने की मांग की थी।
पिता ने कहा कि वर्तमान में उसकी दोनों बेटियां मां के पास रहती है पर वह बेटियों को रखने की बेहतर स्थिति में है। क्योंकि उसकी पत्नी एक डाक्टर है। पेशे के कामकाज के चलते वह बेटियों को पर्याप्त समय नहीं दे पाती है। इस लिहाज से बच्चियों के हित को देखते हुए उन्हें मुझे (पिता को) सौप दिया जाना चाहिए। इस दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि वह अपनी पत्नी से अलग हो चुका है। निचली अदालत में तलाक को लेकर आवेदन प्रलंबित है। पत्नी ने अपने पति (याचिकाकर्ता) पर क्रूरता का आरोप लगाया है और पिछले साल बेटियों को लेकर पति के घर से चली गई है। याचिकाकर्ता ने खंडपीठ ने सामने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की प्रति पेश की जिसमें नाबालिग बच्चों की कस्टडी पिता को सौपी गई थी।
बच्चों के हित पर विचार करना जरूरी
इन फैसलों को देखने के बाद खंडपीठ ने कहा कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बच्चों की हिरासत पिता को सौपी है पर न्यायालय को हर मामले के आधार पर बच्चों के हित पर विचार करना जरूरी है। मौजूदा मामले में लड़कियों की उम्र सात साल से कम है। इस स्थिति में मां ही बच्चों की नैसर्गिक संरक्षक हो सकती है। लड़कियों से बातचीत के बाद महसूस होता है कि मां उनकी देखभाल ठीक तरह से कर रही है। खंडपीठ ने पिता को छूट दी है कि वह निचली अदालत में कस्टडी से जुड़े मुद्दे को उठा सकता है।

