राकेश दुबे@प्रतिदिन। मार्च 2015 के अंत तक दुधिचुआ ने 15 मीट्रिक टन कोयला उत्पादन किया, जो ब्रिटेन के कुल कोयला उत्पादन से भी अधिक है। दुधिचुआ सिंगरौली कोयला-क्षेत्र की 16 खदानों में से एक है। एक को छोड़ कर सभी खदानें सरकार संचालित नार्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के अधीन हैं, जो कोल इंडिया की सहयोगी कंपनी है।
सिंगरौली कोयला आधारित कई थर्मल बिजली संयंत्रों का घर है और कुछ खदानें तो उसकी दहलीज पर हैं। बिजली उत्पादन की उनकी कुल क्षमता करीब 20 गीगावॉट है, जो भारत की कुल राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता का करीब दस प्रतिशत है। सिंगरौली भारत के सबसे बड़े ऊर्जा केंद्रों में से एक हो सकता है, पर यह उपेक्षित है। खदान और पावर स्टेशनों के अलावा यह समूचा कोयला क्षेत्र मुट्ठी भर शहरों, गरीबी से जर्जर गांवों और कुछ उन समृद्ध कॉरपोरेट 'कॉलोनियों' का ठिकाना है, जिनके अपने स्कूल, क्लीनिक और खेल के मैदान हैं। पिछले साल इस कोयला-क्षेत्र का कुल उत्पादन करीब 87 मीट्रिक टन रहा।
सिंगरौली पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हैं। 2013 में संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने बताया था कि वैश्विक औसत तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि रोकने के लिए दुनिया को कार्बन-उत्सर्जन के दृष्टिकोण 'कार्बन बजट' को सख्ती से लागू करना चाहिए। आईपीसीसी के अनुसार, जीवाश्म ईंधन को जलाने की मौजूदा दर इसे 25 वर्षों के अंदर खत्म कर देगी।
भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है, पर इसके पास प्राकृतिक गैस जैसे काफी कम स्वच्छ जीवाश्म ईंधन हैं। करीब 1.3 अरब आबादी में से एक-तिहाई के पास बिजली की सुविधा नहीं है। कोयला मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल निजी और सरकार संचालित खदानों से कुल उत्पादन 620 मीट्रिक टन रहा, जिसमें 85 प्रतिशत से अधिक बगैर सुरंग खोदे मिला। ऊपर से 400 टन आयात किया गया। सिंगरौली और दूसरी जगहों पर उत्पादन में तेज वृद्धि लेन की सरकारी निर्देश हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्पादन बढ़ाने के पक्ष में हैं। दरअसल मोदी सकल घरेलू उत्पाद विकास दर को आठ से 10 प्रतिशत पर फिर से ले जाना चाहते हैं। एक दशक तक यानी 2011 तक भारत इस विकास-दर के साथ था।
सरकार 2020 तक भारत में कोयला उत्पादन को दोगुना देख रही हैं और आयात पर निर्भरता घटाना चाहती हैं।' उन्हों इससे उत्पादन में सालाना 1.5 अरब टन की वृद्धि जारी रहेगी, जिसका ज्यादातर हिस्सा कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्रों में जलाया जाएगा। बीते छह महीनों में सरकार ने 41 नई खनन परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी दी है। विशेषग्य कहते हैं, 'आज से साल 2020 तक हर महीने एक नई खदान शुरू होगी।'
बीते अगस्त में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया था कि साल 2010 से पहले सरकार ने जो 200 से अधिक खान लाइसेंस दिए थे, वे गैर-कानूनी थे। इस फैसले से कई परियोजनाएं बंद होने को मजबूर हुईं। मोदी सरकार ने जो कानून बनाया, उसमें यह प्रावधान है कि सबसे अधिक बोली लगाने वाले को ही कोयला ब्लॉक आवंटित किए जाएंगे। नई खदान को बढ़ावा देने से राज्य सरकारों को काफी लाभ होता है। 'अब तक नीलाम हुए 209 कोयला ब्लॉक से 11694 अरब रुपये आए, जो अगले 30 वर्षों तक राज्यों के खजाने को समृद्ध रखेंगे। इससे उनकी अर्थव्यवस्था की कायापलट हो जाएगी। उन्हें सचमुच में पूंजी की जरूरत थी। अब वे इसे हासिल करेंगे।'
सघन वन क्षेत्र के नीचे भी कई कोयला भंडार हैं। उनमें से कुछ मध्य प्रदेश में सिंगरौली के पास हैं, पर ज्यादातर छत्तीसगढ़ और झारखंड में हैं। वहां जिनकी जमीनें 'अधिग्रहण' के दायरे में आएंगी, वे देश के सबसे गरीब लोग हैं, ज्यादातर आदिवासी। जो भारत को नया कोल बूम देने की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए पर्यावरण सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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