जनलोकपाल और स्वराज पर चुप क्यों हैं केजरीवाल

Updesh Awasthee
संतोष कुमार सिंह/नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी की सरकार इस बार बदली हुई है, जिन मुद्दों पर वह राजनीति बदलने की बात करती थी उसे लेकर अब उसका नजरिया कुछ बदला हुआ है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण जनलोकपाल है। दिल्ली में जनलोकपाल के मुद्दे पर पिछली बार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों में सता छोड़ दी थी।

वहीं, इस बार 49 दिनों के अंदर पार्टी ने अपने लोकपाल की ही छुट्टी कर दी है। दिल्ली में जनलोकपाल, स्वराज, मोहल्ला सभा आदि मुद्दों पर भी केजरीवाल सरकार चुप्पी साधे हुए हैं। अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन से अस्तित्व में आई आम आदमी पार्टी ने सियासत की शुरुआत भी इसी मुद्दे से की थी। पार्टी का कहना था कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए जनलोकपाल जरूरी है। इसलिए सता में आने पर वह दिल्ली में मजबूत जनलोकपाल लाएगी।

कांग्रेस के समर्थन से पिछली बार सता तक पहुंचने के बाद भी इस मुद्दे को लेकर आप ने खूब सियासत की थी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर कांग्रेस का समर्थन नहीं मिलने की बात करते हुए इस्तीफा दे दिया था। उस समय उन्होंने कहा था कि जनलोकपाल के लिए हजार बार भी मुख्यमंत्री का पद छोडऩा पड़े तो वह छोड़ देंगे।

इस बार विधानसभा चुनाव में भी जनलोकपाल मुख्य मुद्दा था। सरकार प्रचंड बहुमत से सत्ता में तो आ गई, लेकिन अब तक इस वादा को पूरा करने के लिए सरकार ने कोई पहल नहीं की है। अलबता आम आदमी पार्टी के आंतरिक लोकपाल एडमिरल रामदास की छुट्टी जरूर कर दी गई है। इससे पार्टी व सरकार दोनों की किरकिरी हुई है क्योंकि मुख्यमंत्री केजरीवाल आप के संयोजक भी हैं। इसलिए माना जा रहा है कि उनके इशारे पर यह कदम उठाया गया है।

आप ने दिल्लीवासियों को स्वराज का भी सपना दिखाया था। पार्टी ने सियासी व सरकारी निर्णय में आम व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित करने का वादा किया था। इसके लिए मोहल्ला सभा गठित करने की घोषणा की गई थी। न तो पिछले कार्यकाल में और न इस बार अब तक इस दिशा में कोई कदम उठाया गया है।

हालांकि, पिछली बार नुक्कड़ बैठकें कर लोगों की राय लेने की कोशिश जरूर हुई थी। इसी तरह से मुख्यमंत्री केजरीवाल सचिवालय में जनता दरबार लगाने का भी असफल प्रयास किए थे। इस बार लोग प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री से जनता दरबार लगाने की मांग कर रहे हैं। महिला सुरक्षा के लिए भी अब तक सरकार द्वारा कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया गया है।

सत्ता मिलते ही लड़खड़ाए आप के पांव
भ्रष्टाचार के खिलाफ सियासत करने निकली आम आदमी पार्टी (आप) के पांव सत्ता मिलते ही लड़खड़ा गए हैं। गरीबों के हक की लड़ाई लडऩे का दावा कर दिल्ली में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली यह पार्टी अब दो फाड़ हो चुकी है। दोस्त अब दुश्मन करार दिए जाने लगे हैं। पार्टी नेताओं के आपसी झगड़े से पार्टी की छवि को निश्चित रूप से भारी धक्का लगा है। सियासी गलियारों में कहा यह जा रहा है कि पार्टी नेताओं में छिड़ी सियासी जंग के कारण दिल्ली के विकास को लेकर सवाल जरूर खड़े होने लगे हैं।

दिल्ली विधानसभा के पिछले दो चुनाव सूबे में एक नए सियासी प्रयोग की दृष्टि से यादगार रहे। राजधानी के लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा लड़ी गई लड़ाई से जन्मी आप को बड़ी उम्मीदों से सत्ता सौंपी। लेकिन यह सरकार महज 49 दिनों में इस्तीफा सौंपकर बाहर हो गई।

इस बात से दिल्ली के लोगों में नाराजगी भी जोरदार रही। इसके बावजूद लोकसभा के चुनाव में राजधानी के लोगों ने इस पार्टी के उम्मीदवारों को खूब वोट दिए। यह अलग बात है कि इसका कोई भी प्रत्याशी जीत नहीं दर्ज कर पाया। इसके बाद हुए विधानसभा के चुनाव में तो दिल्ली ने इतिहास ही रच दिया। जनता ने 70 में से 67 सीटें आप की झोली में डाल दीं।

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