अटलजी नहीं चाहते थे भाजपा का गठन हो: आडवाणी

Updesh Awasthee
रायपुर। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने खुलासा किया कि पहले अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के स्थान पर नई पार्टी बनाने के लिए सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि नई पार्टी को खड़ा करना बेहद कठिन काम था। लेकिन उन्होंने (आडवाणी) ने उन्हें मनाया कि आप और मैं मिलकर यह कर लेंगे। और भाजपा आज सबसे बड़ी पार्टियों में से एक है।

आडवाणी ने रायपुर में न्यू सर्किट हाउस में स्वामी विवेकानंद पर लिखित पुस्तकों के विमोचन कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने कहा कि वह समय था जब समय के साथ पार्टी को बदलने और नए स्वरूप व विचारधारा के साथ खड़ा करने की जरूरत महसूस की जा रही थी।

आडवाणी ने कहा कि वे जब कराची में थे तो बस यही सोचा करते थे कि भारत को कैसे आजाद कराना चाहिए। तब जीवन में और कुछ कर सकूंगा यह सोचा ही नहीं था। 1946 में वे नागपुर में शिक्षक बनकर गए। संघ के संपर्क में आए। वे स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित थे।

आडवाणी के मुताबिक विवेकानंद ने शिकागो में पार्लियामेंट आफ रिलिजन में जो भाषण दिया उससे विश्व में भारत का नाम हुआ। उन्होंने वहां धर्म की ऐसी विवेचना की कि लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि भारत में स्वामी जैसे विचारक हैं तो वहां मिशनरीज भेजने क्या जरूरत है।

विवेकानंद चाहते थे कि भारत मैन मेकिंग मशीन बने जो चरित्रवान लोगों को तैयार करे। राष्ट्र के प्रति समर्पित लोगों का निर्माण करे। आडवाणी ने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि डॉ. हेडगेवार ने इसी परिकल्पना को साकार करने 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी। हालांकि मैं कभी हेडगेवार से नहीं मिला। एक बार डॉ. हेडगेवार से जब राजनीतिक के बारे में पूछा गया था उन्होंने कहा कि एक दास की शासक के रूप में क्या सोच हो सकती है। यानी वे पहले भारत को आजाद देखना चाहते थे।

आडवाणी ने एक दिलचस्प बात कही कि एक समय संघ अखबार को छूने को भी तैयार नहीं था। लेकिन वे जब राजनीति में आए तो अखबार वालों से कहना पड़ता था कि हमारे बारे में छापो। संघ ने देश की उन्नति के लिए बहुत काम किया है।

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