भोजन के अधिकार पर संकट

राकेश दुबे@प्रतिदिन। यह सरकार शुरू से अनुदान कटौती पर जोर देती आ रही है। खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के पूर्व मंत्री शांता कुमार की अगुआई में गठित समिति ने इस कानून के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो रिपोर्ट सौंपी है, वह राजकोष तो भर सकती है पर भोजन  का अधिकार संकट में आ सकता है |समिति का सुझाव है कि खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में कटौती जरूरी है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी तक इस कानून से 75 प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी इलाकों की गरीब आबादी को लाभ मिलता है।

पिछले दिनों खर्चों में कटौती के मद्देनजर जालान समिति ने भी सुझाव दिया था कि सरकार को बड़ी योजनाओं में भारी कटौती करने की जरूरत है। खाद्य सुरक्षा कानून के चलते अभी सरकार को जितना खर्च उठाना पड़ रहा है, उसमें 40 प्रतिशत की कटौती बड़ी राहत दे सकती है। शांता कुमार समिति ने कटौती के अलावा कुछ और महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर सुझाव पेश किए हैं। उनमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरी तरह कंप्यूटरीकृत करना और शहरी इलाकों में गरीबों को दिए जाने वाले अनाज पर अनुदान का पैसा उनके खाते में डालने का सुझाव अहम हैं। समिति का कहना है कि केवल नगद अनुदान का रास्ता अपनाने से सरकार को करीब तीस हजार करोड़ रुपए सालाना की बचत होगी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगढ़िया भी अनुदान के आलोचक रहे हैं।

भारत लंबे समय से भूख सूचकांक के स्तर पर चिंताजनक स्थिति में है। विकास योजनाओं और अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर के बरक्स यहां भुखमरी और कुपोषण के आंकड़े विश्व बिरादरी के सामने शर्म का विषय हैं। ऐसे में गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे लोगों के हिस्से के अनाज में कटौती इस समस्या से पार पाने में बड़ा रोड़ा साबित होगी। मौजूदा कानून के प्रभावी ढंग से लागू न हो पाने को लेकर अंगुलियां उठती रही हैं, उन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश जरूर होनी चाहिए। कुछ लोगों के भोजन का आधार समाप्त कर राजकोष कुछ भले भर जाए, इससे सरकार का मानवीय चेहरा नहीं उभरेगा।

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