देशों के अगड़े-पिछड़े होने के पैमाने

shailendra gupta
राकेश दुबे@प्रतिदिन। यह उन लोगो के लिए सुखद खबर है, जो कृषि को देश की सपन्नता की निशानी मानते है, और उन लोगों के लिए बुरी जो कारखानों को प्रगति की निशानी समझते हैं | वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते तीस वर्षो में खेती-बाड़ी से जीविका चलानेवाले लोगों की आबादी में सबसे तेज गति से इजाफा भारत में हुआ है|
उसकी रिपोर्ट के अनुसार 1980 से 2011 के बीच भारत में खेतिहर आबादी में 50 प्रतिशत और चीन में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि अमेरिका की खेतिहर आबादी में इसी अवधि में 37 प्रतिशत की कमी आयी है|

वर्तमान वैश्विक पैमाने उद्द्योग की प्रगति को विकास का पैमाना मानते हैं, अगर इसे आधार मने तो सबसे ज्यादा पिछड़े एशिया और अफ्रीका में रहते हैं, क्योंकि दुनिया की 95 प्रतिशत खेतिहर आबादी अब भी सिर्फ एशिया और अफ्रीका में ही रहती है| जहाँ तक भारत का सन्दर्भ है बीते तीस वर्षो में खेती-बाड़ी से जीविका चलानेवाले लोगों की आबादी में सबसे तेज गति से वृद्धि  भारत में हुई है| रिपोर्ट के अनुसार 1980 से 2011 के बीच भारत में खेतिहर आबादी में 50 प्रतिशत  और चीन में 33 प्रतिशत  की वृद्धि हुई है, जबकि अमेरिका की खेतिहर आबादी में इसी अवधि में 39 प्रतिशत की कमी आयी है|

आंकड़ों की जादूगरी और पश्चिम के सोच से यह रिपोर्ट भी थोड़ी प्रभावित दिखती है,अगड़े पिछड़े का आधार एशिया-अफ्रीका बनाम यूरोप-अमेरिका के बीच बनाया गया है, कुछ इस तरह की  बात एकदम वैज्ञानिक लगे| 1980 में विश्व में खेती पर आधारित आबादी की संख्या गैर-खेतिहर यानी उद्योगों पर आधारित आबादी के बराबर थी| रिपोर्ट के अनुसार 1980 से 2011 के बीच अफ्रीका में खेतिहर आबादी 63 प्रतिशत  बढ़ी, जबकि गैर-खेतिहर आबादी में 221 प्रतिशत  की वृद्धि हुई| एशिया में खेतिहर आबादी तीन दशकों के बीच 20 प्रतिशत  बढ़ी, जबकि गैर-खेतिहर आबादी 134 प्रतिशत  बढ़ी| बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहने के लिए पैमाना प्रतिशत का बनाया गया है|

लेखक श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com

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