डीपीसी रच रहे हैं भ्रष्टाचार के कीर्तिमान

shailendra gupta
अनूपपुर(राजेश शुक्ला)। जिले में शिक्षा के नाम पर हो रहे भ्रष्ट्राचार में सिर्फ मध्यान्ह भोजन ही एकमात्र स्त्रोत नहीं है बल्कि जिले का संचालन करने वाले सर्व शिक्षा अभियान के जिला परियोजना समन्यवक की कार्यप्रणाली ही संदेह के घेरे में है। इनका कार्य करने का तरीका लोगों के समझ से परे है।

इसी तरीके से इनका कार्य उमरिया जिले में भी इन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे जो साबित भी हो चुके थे, किंतु ऐन वक्त पर इन्होंने राजनैतिक आकाओं के दम पर उन फाईलो को दबवाने में कामयाब हो गये थे और अपना स्थानान्तरण अनूपपुर जिले के लिये करा लिया। इनकी कार्यप्रणाली संदिग्ध है। जब से इन्होंने जिले का प्रभार सम्भाला है तब से इन्होंने भ्रष्टाचार के कई कीर्तिमान भी स्थापित किये हैं। इतना ही नहीं इन महाशय द्वारा कलेक्टर को गलत जानकारी देकर फाईलों में हस्ताक्षर करा लिये जाते हैं और कलेक्टर के आदेश को ये तो कुछ नहीं मानते हैं। 

अज्ञात  वाहन का भी होता है भुगतान-सर्व शिक्षा अभियान में जब से इनकी पदस्थापना जिला परियोजना समन्वयक पर हुई है तब से महाशय अपने ढंग से कार्यालय को संचालित कर रहे हैं। इन्हें शासन या कलेक्टर के आदेशों से कोई लेना-देना नहीं है। ये इतने बेलगाम है इन्होंने सभी शासन के नियमों को ताक पर रखकर अपने कार्यालय से तीन वाहन किराये के बिल प्रतिमाह आहरण करते हैं। और यह वाहन कहां चलते हैं यह किसी को ज्ञात नहीं है। इतना ही नहीं इन वाहनों के नंबर क्या है यह इनके अधीनस्थ अधिकारी कर्मचारियों को भी नहीं मालूम। और यह क्रम गत तीन वर्षो से चल रहा है। 

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इन्होंने एक वाहन जिला पंचायत के मुख्य कार्यापालन अधिकारी की सेवा में सफारी गाड़ी लगा रखी है। और इसका भुगतान सर्वशिक्षा अभियान से किया जाता है। एक वाहन स्वयं चलते हैं जो स्वयं प्रतिदिन शहडोल से अनूपपुर आते जाते हैं। जिसका डीजल व गाडी का भुगतान भी कार्यालय से होता है। किंतु तीसरे वाहन का ज्ञात नहीं है कि वह कहां चलता हैं, किंतु बिल उस अज्ञात वाहन का भी निकाला जाता है। 

भगवान भरोसे छात्रावास

सर्व शिक्षा अभियान से संचालित छात्रावास भगवान भरोसे चल रहे हैं। पड़मानिया जहां वार्डन के पद पर श्रीमती मधुवाला मरावी नियुक्त है वहां समयलाल पांडेय द्वारा कैश बुक संचालन करते हुये समस्त लेन देन किया जा रहा है जिला शिक्षा केन्द्र का कहना है कि पांडेय को यह दायित्व कलेक्टर साहब ने सौंपा है। छात्रावास दमेहड़ी की छात्र संख्या २० है पर खर्च ५० छात्र संख्या के अनुसार निकालकर किया जा रहा है। 

केजीबीव्ही किरगी में कोई वार्डन नियुक्त नहीं है पर तीन वर्ष से बीआरसी में बीजीसी पद पर नियुक्त श्रीमती राजश्री शर्मा के अतिरिक्त प्रभार देकर संचालन हो रहा है जबकि सीईओ जिला पंचायत द्वारा उन्हें ४ जुलाई ०१३ को मुक्त कर दिया गया है। छात्रावास भालूमाड़ा में पदस्थ सहायक वार्डन प्रीती कुशवाहा को वार्डन का प्रभार दिया गया है जबकि कुशवाहा अपै्रल में त्यागपत्र देकर संविदा शाला शिक्षक वर्ग ३ पद पर हैं। इसके बाद एक अनुमोदन के बाद विकलांग छात्रावास  अनूपपुर में अधीक्षक बना दिया गया । जिले के चार केजीबीव्ही रखे चार बालिका छात्रावासों में ३ हजार के अग्रिशमन यंत्र २६ हजार रूपयें में खरीदे गयें हैं। 

फर्जी आहरण कांड

फर्जी आहरण कांड एवं  फर्जी अंकसूची के अभियुकत को ६ महीने पूर्व से एपीसी बनाकर उसे आरोप से बचाने का प्रयास किया जा रहा है। छात्रावासों की दयनीय स्थिती का आंकलन इसी से किया जा सकता है कि वार्डन पद की न्यूनतम अर्हता को नजर अंदाज करते हुये गुरूजी और सहायक वार्डन द्वारा संचालन हो रहा है।

तानाशाह रवैया

राज्य शिक्षा केन्द्र और स्थानीय जिला प्रशासन को जेब में रखकर तानाशाही रवैया अपनाये हुये डीपीसी ने राज्य शिक्षा केन्द्र को गुमराह करते हुये डीपीसी पद हेतु जारी विज्ञापन का माखौल उडाते हुये मनमाने तरीके से नियुक्ती कर प्रशासन को गुमराह कर दिया। राज्य शिक्षा केन्द्र ने बीआरसी पद हेतु विज्ञापन २३ जुलाई ०१३ को जारी किया और २४ जुलाई ०१३ को दीपक कुमार पांडेय राजनगर की नियुक्ती कर डाली। १९ जुलाई ०१३ को कं्र . डिस्पैच ९७१ में आदेश दे दिया गया जब २४ जुलाई ०१३ को अन्य आवेदन फार्म जमा करने पहुंचे तो बताया गया कि इस रिक्त पद हेतु जिसका विज्ञापन २३ जुलाई ०१३ को जारी हुआ था उसकी नियुक्त १९ जुलाई ०१३ को भर दी गई है।

अंधेरे में जिला प्रशासन

इस पूरे घटनाक्रम में जिला प्रशासन को अंधेरे में रखा जा रहा है या जिला प्रशासन स्वयं कुछ नहीं जानना चाहता। जानबूझ कर डीपीसी का सहयोग कर रहे हैं। इतना ही नहीं राज्य शिक्षा केन्द्र भी इनके कार्य प्रणाली को अपना समर्थन देता हुआ प्रतीत होता है । ऐसा लग रहा है कि राज्य शिक्षा केंद्र ने डीपीसी को इस जिले को ठेके पर दे दिया है और ठेकेदार बनकर डीपीसी महोदय शासन के पैसों से जमकर गुलछर्रे उडा रहे है इसके साझेदार वे सभी लोग है जो इनका मूक समर्थन कर रहे हैं। डीपीसी में इतना अहम है कि वो यह कहते हैं कि अधिकारी और नेताओं को देने के लिये मैं अगर कुछ करता हॅू तो मेरा  कोई कुछ नही बिगाड़ सकता जहां चाहे शिकायत कर दो मंत्री से  मैं सबसे निपट लूॅगा। जो कल तक सर्वशिक्षा के मामले में यह जिला अव्वल था आज अंतिम में गिना जा रहा है। 

शहडोल से करते हैं अपडाउन

डीपीसी अपना मुख्यालय शहडोल बना रखा है। यही से रोज आना-जाना करते है । वह भी शासकीय वाहन से जिसका किराया सर्वशिक्षा वहन करता है। इसके साथ ही इनके द्वारा मकान भाड़ा भत्ता भी शासन से लिया जाता है, जबकि नियम है कि अधिकारी मुख्यालय में रहें तभी उन्हें मकाना भाड़ा भत्ता मिलेगा, परंतु ये महाशय नियमों को ताक पर रखकर शिक्षा के पैसे को अपना समझकर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और इनके साथ इनके पिछलग्गू जिन्हें ये उल्टा-सीधा कार्य कराते हैं और कार्यालय की फाईल भी इनके लोगों द्वारा गोल होती है या यूं कहे कि इन सब के सर्गना अधिकारी ही हैं। इन पर अगर शीघ्र लगाम नहीं लगाई गई तो जिले का सर्वशिक्षा अभियान मात्र कागजों में ही रह जायेगा। यथार्थ में कुछ नहीं होगा।



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