शाजापुर। शिक्षा की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं इसलिए ढेर हो गईं क्योंकि ये जमीनी हकीकत से बहुत दूर थीं। फिर रही सही कसर भ्रष्टाचार और अधिकारियों की लापरवाही ने पूरी कर दी। मिड डे मील का भी यही हाल है। सिटिज़न जर्नलिस्ट राजेश कुमरावत ने मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले के एक स्कूल का मुआयना किया और पाया कि मिड डे मील योजना एक मजाक बन कर रह गई है।
शाजापुर के ढोलाखे़डी गांव में मिड डे मील योजना के नाम पर बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। ढोलाखेड़ी गांव के प्राइमरी स्कूल में बच्चे सब्जी की जगह पानी से रोटी छूआ कर पेट भरने की कोशिश करते हैं। यहा रोजाना इसी तरह का खाना परोसा जाता है। खाना एक सहायता समूह तैयार करता है। जिसे प्रत्येक बच्चे के हिसाब से पैसे दिए जाते हैं। शिक्षक भी बेबस हैं कि आखिर वो करें भी तो क्या। सरकार 3 रुपये का बजट एक बच्चे पर देती है उसमे कैसे गुणवत्ता लाएं।
जिन बच्चों को परोसा हुआ खाना कम प़ड़ जाता है। वो थाली में और पानी डालकर पेट भरने की कोशिश करते हैं। स्कूल की दीवार पर मेनू लगा हुआ है। इसके अनुसार बच्चों को संतुलित आहार दिया जाना है। लेकिन ये महज दिखावा है। दरअसर खाना मेनू के मुताबिक नहीं, खाना बनाने वालों की मर्जी के मुताबिक बनाया जाता है। खाने से भी अहम चीज है पीने का पानी। इस स्कूल में पीने के पानी का इंतजाम ही नहीं है। बच्चे जो पानी पी रहे हैं वो दूषित है और इसे पीना सेहत के लिए खतरनाक है।
हैंडपंप के पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा है। इससे बच्चों की हड्डी गलने की संभावना रहती है। इसलिए बच्चों को बोटल दे दी गई है घर से पानी लाने के लिए। शाजापुर के ज्यादातर स्कूलों में मिड डे मील और पीने के पानी का इंतजाम ठीक नहीं है। प्रशासन का इस बारे में क्या कहना है ये जानने के लिए हमने मुख्य कार्यपालक अधिकारी से बात की। लेकिन वहां भी रवैया टालमटोल वाला ही रहा। कुल मिलाकर योजना के साथ-साथ बच्चे भी रामभरोसे हैं।