नईदिल्ली। कर्नाटक के चुनावी नतीजों पर सबकी नजरें टिकीं हैं। टिकिने के कारण अलग अलग हैं परंतु नजरें तो टिकी ही हैं। मध्यप्रदेश के कुछ चुनावी पंडित भी इस ओर देख रहे हैं, क्योंकि कर्नाटक के नतीजे और रिफरेंस मध्यप्रदेश में काम आने वाले हैं। खासकर येदियुरप्पा की बगावत के किस्से।
कर्नाटक में येदियुरप्पा से पहले कई दूसरे राज्यों में क्षत्रप बागी हुए और उनमें से कई बुझे हुए पटाखे साबित हुए। अब येदियुरप्पा का हश्र या भाजपा का नुकसान देखने की बारी है।
भाजपा से बगावत करने वाले दिग्गजों की भारत में कोई कमी नहीं है, लेकिन बागावत के बाद कोई ज्यादातर फुस्सी बम निकले। उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह, गुजरात में शंकर सिह बाघेला और केशूभाई पटेल कोई खास करिश्मा नहीं दिखा पाए। ये दिग्गज नेता भाजपा से बाहर होने के बाद पार्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सके, बल्कि खुद ही हाशिए पर चले गए।
उमा भारती भी भाजपा में लौट आईं। भाजपा से बाहर होने के बाद उन्होंने भारतीय जनशक्ति नाम से पार्टी बनाई थी और चुनावों में मध्य प्रदेश में प्रत्याशी भी उतारे थे। लेकिन उनकी पार्टी फ्लाप शो साबित हुई।
उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह कभी भाजपा के दिग्गजों में से थे। उनके नाम से राज्य में भाजपा जानी जाती थी। वे दो बार भाजपा से बाहर हुए और दोनों ही बार पार्टियां (राष्ट्रीयक्रांति पार्टी और जनशक्ति पार्टी) बनाई। दो-चार से ज्यादा सीटों पर ही उन्हें सफलता मिल सकी। जब सफलता नहीं मिली तो इसी साल जनवरी में बहू-बेटे के साथ भाजपा में शामिल हो गए।
राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद से भाजपा में शामिल होने की उनकी सारी खुशी काफूर हो गई। कल्याण सिंह के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती अपने बहू-बेटे को स्थापित करने की है। भाजपा से बाहर होने के बाद दोनों किसी सदन के सदस्य नहीं है। यह कल्याण सिंह की सबसे बड़ी चिंता है।
उत्तर प्रदेश के अलावा गुजरात में शंकर सिह बाघेला और केशूभाई पटेल को वहां का कद्दावर नेता माना जाता है। दोनों ही गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बाघेला जब भाजपा से अलग हुए तो उन्होंने राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई और कामयाबी नहीं मिली तो कांग्रेस में शामिल हो गए। यूपीए की पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। इस बार के गुजरात विधानसभा चुनाव में उनका वहां कोई करिश्मा नहीं दिखा।
इसी तरह केशूभाई पटेल ने भी भाजपा से अलग होने के बाद गुजरात विकास पार्टी बनाई प्रत्याशी भी खूब लड़ाए, लेकिन मोदी का तो कोई नुकसान कर नहीं पाए।
अब बारी येदियुरप्पा और कर्नाटक की है। मध्यप्रदेश के राजनैतिक पंडित वहां नजरें इसलिए टिकाएं हुए हैं क्योंकि येदियुरप्पा और कर्नाटक के नतीजों के बाद वहां की कहानियां मध्यप्रदेश की राजनीति हैंडल करने या दूसरे कई टूल्स के रूप में काम आएंगी। देखते हैं क्या होता है कर्नाटक में।