चंदा बारगल/ धूप-छांव/ कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे देश को हिला देने वाले दिल्ली के गेंगरेप की घटना के बाद उद्वेलित महिलाओं,युवतियों और युवाओं ने धरना—प्रदर्शन कर महिलाओं पर ज्यादती करने वालों को फांसी दिए जाने और कानून में संशोधन करने की मांग की थी। सजा के बारे में पुनर्विचार करने के लिए गठित जस्टिस वर्मा की समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है।
जस्टिस वर्मा ने बलात्कार की सजा के लिए फांसी या केमिकल कास्ट्रेशन की सिफारिश नहीं की है, पर जो सिफारिशें की वे महत्वपूर्ण हैं और उससे भी महत्व की बात यह कही है कि कानून का पूरा और तेजी से क्रियान्वयन होना चाहिए।
हमारे देश में समस्या अच्छे कानून की नहीं, बल्कि कानून के क्रियान्वयन की है। भारत का संविधान पूरी दुनिया के श्रेष्ठ संविधानों में एक है। सवाल केवल कानून के संपूर्ण, उचित और तेजी से अमल का है। कानून की जब भी बात होती है तो एक बात बार—बार कही जाती है कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएं लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए। निर्दोष के लिए तो यह बात सही है, लेकिन छूट जाने वाले गुनाहगारों का क्या? कानून की खामियों का फायदा उठाकर छूट जाने वाले गुनाहगार बाद में निर्दोष लोगों पर ही अत्याचार करते हैं।
दिल्ली की युवती पर चालू बस में हुए गेंगरेप के बाद लोगों का आक्रोश चरम पर पहुंच गया था। केंद्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के तमाम शहरों, यहां तक कि गांव—कस्बों से एक ही मांग उठी थी कि बलात्कारियों को फांसी दो। हमारे देश में बलात्कार के जुर्म की सजा पर्याप्त नहीं है। सरकार ने सजा के पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में तीन सदस्यीय समिति गठित की थी।
इस समिति की रिपोर्ट में एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि रिपोर्ट तयसीमा में आ गई, नहीं तो हमारे देश में जांच समितियों, आयोगों की रिपोर्ट आगे, आगे और आगे बढ़ती जाती है। यह जरूर है कि इस रिपोर्ट में लोगों की अपेक्षा के मुताबिक सिफारिशें नहीं है। जस्टिस वर्मा ने फांसी या केमिकल कास्ट्रेशन की सजा को उचित नहीं माना है और अधिकतम सजा आजीवन कारावास करने की सिफारिश की है। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने अपनी रिपोर्ट में दूसरी जो बातें की हैं,वे समझने और अमल में लाने जैसी हैं। उन्होंने कहा है कि देश में पहले से लागू कानून पर्याप्त हैं और उन पर उचित क्रियान्वयन हो तो भी महिलाओं के खिलाफ अत्याचार रूक सकते हैं।
संयोग देखिए कि जिस दिन जस्टिस वर्मा अपनी रिपोर्ट पेश करते हैं, उसी दिन एक युवती भरी अदालत में इसलिए जहर गटक लेती है। क्यों? केवल इसलिए कि पांच साल बीत गए लेकिन बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह एक हकीकत है कि कोई बड़ी घटना घटित होती है, तभी जन-भावनाओं में उबाल आता है। लोग सड़क पर उतर आते हैं और अपना गुस्सा जताते हैं। यह बात अच्छी है। जस्टिस वर्मा ने भी जन-आंदोलन को सराहा है पर दूसरी तमाम घटनाओं के मामले में हमारी संवेदना को क्या हो जाता है?
जस्टिस वर्मा की समिति ने, बलात्कारियों को कितनी और कैसी सजा हो, इस बारे में लोगों से राय, सुझाव मांगे थे। 80 हजार लोगों ने राय, सुझाव दिए। आंकड़ा देखें तो लगता है कि आंकड़ा अच्छा है किंतु थोड़ी दूसरी तरह देखें तो लगता है कि भारत की एक अरब से अधिक आबादी में केवल 80हजार ही। प्रतिशत निकाले तो शून्य.शून्य, शून्य कुछ आएगा। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे लोग कितने जागरूक हैं।
जस्टिस वर्मा ने पुलिस के रवैये पर भी टिप्पणी की है। बलात्कार का शिकार युवती निर्वस्त्र खुले में पड़ी थी और पुलिस चर्चा में मशगूल थी। ऐसे वाक्ये अधिकांश प्रकरणों में होते हैं। हादसे के बाद जख्मी तड़पते रहते हैं और पुलिस पंचनामा बनाने में जुटी रहती है! बलात्कार के मामले में पुलिस को जवाब देते वक्त, अस्पताल में चेकअप के समय और बाद में अदालत में प्रकरण चलता है तब शारीरिक बलात्कार का शिकार युवती पर अनेक बार बलात्कार होता है। यह सब रूके, वही बहुत है।
देश में कानून तो अच्छे हैं पर उन पर ठीक से अमल नहीं होता। अधिकांश फास्ट ट्रेक अदालतें नाममात्र की फास्ट हैं। उनका काम किसी छुकछुक गाड़ी जैसा होता है। हकीकत में संविधान में इतना संशोधन होना चाहिए कि हरेक अपराध के फैसले का समयसीमा तय कर दी जाना चाहिए। उतनी अवधि में फैसला आ जाना चाहिए। समस्या कानून की नहीं, उस पर अमल की है। अब सरकार कानून पर अमल कैसे हो, इसके लिए कहीं समिति गठित न कर दे, क्योंकि हमारी सरकार समय जाया करने और मुद्दों को टालने में माहिर है।
