भोपाल(उपदेश अवस्थी)। उद्योगपति राजीव गौड़ की मौत ने रेलवे की लापरवाही पोल खोल दी है। एक जान की सुरक्षा के लिए लोग गिड़गिड़ाते रहे लेकिन किसी ने कोई मदद नहीं की। इस मामले कई तकनीकी पहलू है जो हर कदम पर रेलवे की लापरवाही उजागर करते है।
आइए गौर करते है कुछ बिन्दुओं की तरफ, यदि इनमें से एक भी जगह सतर्कता बरती जाती तो शायद सबकुछ ठीक हो सकता था।
श्री गौड़ के सुरक्षागार्ड ने तत्काल इसकी सूचना स्टेशन मास्टर को दी थी। स्टेशन मास्टर बिना विलम्ब किए रेल रुकवा सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। डीआरएम भोपाल ने उन्हें सस्पेंड कर दिया, परंतु इस मामले में डीआरएम की सेन्ट्रलाइज्ड डिसीजन पॉलिसी की पोल खोल दी। यदि डीआरएम अपने अधीनस्थों को इस हेतु स्वीकृति देते तो स्टेशन मास्टर गार्ड को वो जबाब नहीं देता जो दिया गया और कम से कम डीआरएम का नंबर ही दे देता, परंतु डीआरएम का डर इतना ज्यादा था कि स्टेशन मास्टर ने डीआरएम की डांट से बचने के लिए एक इंसान को मौत के मुंह में जाने दिया।
हर ट्रेन में एक गार्ड होता है, उसका डिब्बा सबसे पीछे होता है और वो ग्रीन सिग्नल देता ही तब है जब उसे दिखाई दे कि रेल में सबकुछ ठीक है। उसके पास स्पेशल पॉवर होते हैं और वो कभी भी रेल को रोक सकता है। उनकी नियुक्ति और तैनाती ही दुर्घटना रोकने के लिए होती है। सनद रहे कि एक रेल बिना टीसी के चल सकती है, लेकिन बिना गार्ड के कभी नहीं चलती। सवाल यह है कि गार्ड ने बिना देखे ग्रीन सिग्नल क्यों दिया।
टेन जब चलती है तो किनारे पर आने वाले दरवाजे, और दूसरे चैकपोस्ट बने होते हैं जहां खड़ा एक आदमी रेल पर नजर रखता है और यदि कोई गड़बड़ हो तो रेड सिग्नल देता है। गाड़ी को तत्काल रोक दिया जाता है। सवाल यह है कि क्या पूरा का पूरा रेलवे स्टाफ ही सोया हुआ था।
गार्ड आरपीएफ थाने भी गया परंतु थाना बंद था। यदि थाना खुला होता तो शायद कोई संभावना बनती परंतु रेलवे पुलिस की लापरवाही ने एक व्यक्ति को मौत तक पहुंचा दिया।
पूरा का पूरा मामला रेलवे की लापरवाह व्यवस्था की पोल खोलता है। केवल एक स्टेशन मास्टर को सस्पेंड कर देने से इतिश्री नहीं होती। जरूरत है व्यवस्था के सूत्र संचालक डीआरएम अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझें।