देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए श्री सुक्तम सबसे संक्षिप्त और सफल उपाय माना जाता है। श्रीसूक्त ऋग्वेद से सम्बद्ध एक अत्यंत प्रसिद्ध वैदिक स्तोत्र है। लाखों लोग श्री सुक्तम का पाठ करके लाभान्वित होते हैं। पूर्णिमा तिथि, दीपावली की लक्ष्मी पूजा तथा अन्य शुभ अवसरों पर भी श्रीसूक्त का पाठ किया जाता है। शुक्रवार की संध्या में भी पूजा कर सकते हैं। हम यहां पर आपको संस्कृत के साथ हिंदी अर्थ भी दे रहे हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते तो केवल हिंदी में पढ़िए, समान फल प्राप्त होगा:
श्लोक 1: ऊँ ह्रीं हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥
अर्थ: हे जातवेदा अग्निदेव! आप सोने के समान कांतिवान, स्वर्ण एवं रजत की मालाओं से अलंकृत, चंद्रमा के समान प्रकाशमान और सुवर्णमयी स्वरूपा भगवती लक्ष्मी का मेरे यहाँ आह्वान कीजिए।
श्लोक 2
तां म आवह जातवेदो लक्ष्म्यमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गां अश्वं पुरुषानहम्॥२॥
• अर्थ: हे जातवेदा अग्निदेव! आप ऐसी लक्ष्मी जी को मेरे यहाँ पधराइए जो कभी छोड़कर न जाने वाली (स्थिर) हों, और जिनकी कृपा से मुझे सुवर्ण, गोधन, घोड़े और उत्तम परिवार का सुख प्राप्त हो।
श्लोक 3
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं म देवीमाह्वये श्रीर्मा जुहैषती॥३॥
• अर्थ: जिनके आगे घोड़े और मध्य में रथ चलते हैं, जो हाथियों की चिंघाड़ से प्रसन्न होने वाली हैं, उन दैवी स्वरूपा भगवती श्री (लक्ष्मी) का मैं आह्वान करता हूँ। वे देवी लक्ष्मी मुझ पर प्रसन्न होकर मेरे यहाँ निवास करें।
श्लोक 4
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मस्थिते पद्मवर्णां तामिहोपये श्रियम्॥४॥
• अर्थ: जो कमनीय हैं, मंद-मंद मुसका रही हैं, सोने की चारदीवारी जैसी कांति वाली हैं, करुणा से आर्द्रा हैं, तेज से प्रज्वलित हैं, स्वयं तृप्त हैं और भक्तों को तृप्त करने वाली हैं, जो कमल पर विराजमान हैं और कमल के समान वर्ण वाली हैं, उन लक्ष्मी जी को मैं अपने यहाँ बुलाता हूँ।
श्लोक 5
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तामीं पद्यस्थिनामपद्माक्षीं श्रियं महये शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मश्य नश्यतां त्वावृणे॥५॥
• अर्थ: जो चंद्रमा के समान प्रकाशमान, अपने यश से प्रज्वलित, समस्त संसार में देवगणों द्वारा पूजित और उदार हैं, जो कमल पर विराजमान और कमल के समान नेत्रों वाली हैं, उन लक्ष्मी जी की मैं शरण लेता हूँ। हे देवी! मेरे जीवन की अलक्ष्मी (दरिद्रता) का नाश हो, मैं आपका वरण करता हूँ।
श्लोक 6
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥६॥
• अर्थ: हे सूर्य के समान तेजस्वी वर्ण वाली माँ! आपकी तपस्या से ही बिल्व (बेल) वृक्ष उत्पन्न हुआ है। आपके उस पवित्र बिल्व वृक्ष के फल मेरी आंतरिक अज्ञानता और बाहरी दरिद्रता (अलक्ष्मी) का नाश करें।
श्लोक 7
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मरिणा सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥७॥
• अर्थ: देवसख (कुबेर) और कीर्ति के साथ भगवती लक्ष्मी मेरे पास आएँ। मैं इस राष्ट्र (घर/परिवार) में उत्पन्न हुआ हूँ, हे देवी! मुझे कीर्ति और ऋद्धि (संपन्नता) प्रदान कीजिए।
श्लोक 8
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥८॥
• अर्थ: मैं भूख, प्यास और मलिनता को दूर करने तथा ज्येष्ठा (दरिद्रता की देवी) का नाश करता हूँ। हे देवी! मेरे घर से समस्त प्रकार की अस्मृद्धि (अभाव) और दरिद्रता को पूरी तरह दूर कर दीजिए।
श्लोक 9
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपये श्रियम्॥९॥
• अर्थ: जो सुगंध से पहचानी जाती हैं, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, जो नित्य-पुष्ट (संपन्न) हैं, गोबर (गो-संतान व कृषि समृद्धि) में जिनका वास माना गया है, और जो समस्त जीवों की ईश्वरी हैं, उन भगवती लक्ष्मी का मैं अपने घर में आह्वान करता हूँ।
श्लोक 10
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्र्यतां यशः॥१०॥
• अर्थ: हमारे मन की कामना और संकल्प सिद्ध हों, हमारी वाणी सत्य हो। पशुओं के रूप में धन और अन्न की प्राप्ति हो, तथा यश और श्री (लक्ष्मी) मुझमें निवास करें।
श्लोक 11
कर्दमेन प्रजाक्ता संभव कर्दम श्रियम्।
वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥
• अर्थ: हे कर्दम् (लक्ष्मी जी के ऋषि पुत्र या सृष्टिकर्ता)! आप लक्ष्मी जी को उत्पन्न करने वाले हैं, इसलिए हे कर्दम्! आप माता पद्ममालिनी (कमल की माला धारण करने वाली) लक्ष्मी जी को मेरे कुल (परिवार) में स्थापित कीजिए।
श्लोक 12
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥
• अर्थ: नदियाँ (जल) स्निग्धता या स्नेह उत्पन्न करें। हे चिक्लीत (लक्ष्मी जी के दूसरे पुत्र)! आप मेरे घर में निवास करें और देवी माता श्री (लक्ष्मी) को मेरे कुल में वसाइए।
श्लोक 13
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥
• अर्थ: हे जातवेदा अग्निदेव! जो जल के समान कोमल (आर्द्रा), कमल-पुष्प पर विराजित, पुष्टि-स्वरूपा, स्वर्ण के समान कांतिवान, सुवर्ण की माला पहनने वाली, चंद्रमा के समान कांतिमान और सुवर्णमयी हैं, उन लक्ष्मी जी को मेरे लिए लाइए।
श्लोक 14
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१४॥
• अर्थ: हे जातवेदा अग्निदेव! जो करुणा से आर्द्रा हैं, ऐश्वर्य देने वाली हैं, उत्तम स्वर्ण और सोने की मालाओं से सुसज्जित हैं, सूर्य के समान प्रकाशमान और सुवर्णमयी हैं, ऐसी भगवती लक्ष्मी को मेरे लिए पधराइए।
श्लोक 15
तां म आवह जातवेदो लक्ष्म्यमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभवे गामश्वं पुरुषानहम्॥१५॥
• अर्थ: हे जातवेदा अग्निदेव! आप ऐसी लक्ष्मी जी को मेरे यहाँ लाइए जो कभी न जाने वाली हों, और जिनकी कृपा से मेरे घर में प्रचुर स्वर्ण, गोधन, घोड़े और उत्तम सेवक-पुत्रों का वैभव हमेशा बना रहे।
श्लोक 16
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकः सततं जपेत्॥१६॥ ह्रीं ऊँ
• अर्थ: जो मनुष्य पवित्र और संयमी होकर प्रतिदिन अग्नि में घी की आहुति देता है और इन पंद्रह (मुख्य) ऋचाओं वाले श्री सूक्त का निरंतर पाठ करता है, वह संपूर्ण श्री (ऐश्वर्य और लक्ष्मी) को प्राप्त करता है।

