खजराना अतिक्रमण 30 दिन के भीतर हटाएं: श्रीराम बिल्डर्स मामले में हाई कोर्ट का आदेश

Updesh Awasthee
इंदौर, 28 अक्टूबर 2026:
सरकारी सिस्टम का तमाशा देखिए। प्राइवेट पार्टी की जमीन को सरकारी स्कीम में शामिल कर लिया। मामला कोर्ट में पहुंचा दो जमीन पर अतिक्रमण करवा दिया। कलेक्टर ने सुप्रीम कोर्ट में अंडरटेकिंग दी की 45 दिन में अतिक्रमण हटवा दूंगा लेकिन एसडीएम ने विवादित जमीन पर एक नया मामला स्वीकार कर लिया और कलेक्टर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया। श्रीराम बिल्डर्स वाले करोड़ों की जमीन खरीदने के बाद भी, संपत्ति का अधिकार पाने के लिए दर-दर भटकते रहे। 

2003 से शुरू हुआ विवाद और IDA की योजनाएँ

यह पूरा मामला इंदौर जिले की खजराना तहसील स्थित सर्वे नंबर 66/2(क) की 0.720 हेक्टेयर कृषि भूमि से जुड़ा है। मेसर्स श्रीराम बिल्डर्स (अधिकृत भागीदार शशिभूषण खंडेलवाल) ने इस भूमि को 31 मार्च 2003 को पंजीकृत विक्रय पत्र (Registered Sale Deed) के माध्यम से खरीदा था और वर्ष 2003-04 से ही उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में बतौर 'भूमिस्वामी' दर्ज चला आ रहा है। 

वर्ष 2006 में इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) ने इस जमीन को अपनी 'योजना क्रमांक 132' और बाद में 'योजना क्रमांक 171' में शामिल कर लिया था। इसके खिलाफ श्रीराम बिल्डर्स ने याचिका (W.P. No. 14605/2006) दायर की, जिसमें भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया। इस फैसले को फुल बेंच (W.A. No. 1455/2007) और फिर सर्वोच्च न्यायालय में IDA की एसएलपी (SLP) खारिज होने के बाद भी बरकरार रखा गया। अंततः 8 अप्रैल 2015 को पुनरीक्षण अधिकारी के आदेश से जमीन को योजना से मुक्त किया गया और IDA ने निजी विकास के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया। 

सीमांकन में हुआ अतिक्रमण का खुलासा और तहसीलदार का आदेश

जमीन योजना से मुक्त होने के बाद 17 जनवरी 2017 को राजस्व निरीक्षक द्वारा जब जमीन का सीमांकन (Demarcation) कराया गया, तो खुलासा हुआ कि भू-खंड पर लगभग 70 अनाधिकृत कब्जाधारियों (अतिक्रामकों) ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। 

इसके बाद श्रीराम बिल्डर्स ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 (MPLR Code) की धारा 250 के तहत तहसीलदार के समक्ष बेदखली और कब्जा वापस पाने की याचिका (प्रकरण क्र. 4/A-70/2017-18) लगाई। तहसीलदार ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद 25 जून 2018 को आदेश जारी कर अतिक्रमण हटाने और कब्जा श्रीराम बिल्डर्स को सौंपने के निर्देश दिए। 

अपील दर अपील: तहसीलदार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी लड़ाई

तहसीलदार के आदेश को अतिक्रामकों ने राजस्व और न्यायिक मंचों पर लगातार चुनौती दी। एसडीओ (SDO) एवं अपर आयुक्त (Additional Commissioner) द्वारा अतिक्रामकों की अपीलें 4 अप्रैल 2019 और 8 अगस्त 2019 को खारिज कर दी गईं। अतिक्रामकों ने हाईकोर्ट में याचिका (M.P. No. 5156/2019) लगाई, जो 1 अक्टूबर 2020 को खारिज हुई। इसके बाद दायर रिट अपील (W.A. No. 1233/2020) भी युगलपीठ ने 16 दिसंबर 2020 को खारिज कर दी। 

अदालती आदेशों के बावजूद जब प्रशासन ने कब्जा नहीं दिलाया, तो श्रीराम बिल्डर्स ने रिट याचिका (W.P. No. 5857/2021) और फिर रिट अपील (W.A. No. 1224/2023) दायर की। 25 अक्टूबर 2023 को युगलपीठ ने कलेक्टर, एसडीओ और पुलिस प्रशासन को 45 दिनों के भीतर जमीन खाली करवाकर कब्जा सौंपने का आदेश दिया। अतिक्रामकों ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP No. 22314/2024 / SLP Civil No. 13284/2024) के माध्यम से चुनौती दी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 18 जून 2024 को पूरी तरह खारिज कर दिया। 

अवमानना याचिका और एसडीओ के आदेश का नया विवाद

सर्वोच्च न्यायालय से जीत के बाद भी आदेश का पालन न होने पर श्रीराम बिल्डर्स ने अवमानना याचिका (CONC No. 109/2024) दायर की, जिसमें इंदौर कलेक्टर श्री आशीष सिंह आईएएस ने 12 अप्रैल 2024 को वचनपत्र (Undertaking) दिया कि 30 जून 2024 तक आदेश का अनुपालन कर दिया जाएगा। इसी बीच, कुछ नए आपत्तिकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं (W.P. No. 3337/2024 व अन्य) दाखिल कर दावा किया कि वे इस भूमि पर रहते हैं और उनका पक्ष नहीं सुना गया। उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें एसडीओ के समक्ष अभ्यावेदन (Representation) देने की छूट दी गई थी परंतु, 11 मार्च 2024 को एसडीओ इंदौर ने आदेश जारी कर धारा 250 की नई कार्यवाही शुरू कर दी और पूर्व के अदालती निर्देशों का पालन करने से पीछे हट गए। 

एसडीओ के इस रवैये के खिलाफ श्रीराम बिल्डर्स ने रिट याचिका (W.P. No. 18150/2024) दायर की, जबकि प्रेमलता अग्रवाल (CONC No. 2907/2024) एवं श्याम सिलावट (CONC No. 3112/2024) ने भी अवमानना याचिकाएं प्रस्तुत कीं। 

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला एवं Landmark Judgments

न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने 27 अक्टूबर 2026 को इन सभी मामलों पर एक साथ निर्णय सुनाते हुए माना कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों की अनदेखी करना कार्यपालिका का न्यायिक क्षेत्र में अनुचित हस्तक्षेप (Executive Overreach) है। 

अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण नियमों और नजीरों का उल्लेख किया:
अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध पंजीकृत विक्रय पत्र धारक को उसकी संपत्ति के उपयोग से वंचित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 तथा अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। 

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54: अदालत ने W.A. No. 1487/2024 के निर्णय का संदर्भ देते हुए कहा कि केवल इकरारनामा (Agreement to Sale) या नगर निगम के रिकॉर्ड में नामांतरण (Mutation) से किसी व्यक्ति को मालिकाना हक नहीं मिल जाता। 

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'हरि कृष्णा मंदिर ट्रस्ट' एवं 'डायरेक्टर्स ऑफ सेटलमेंट्स, आंध्र प्रदेश बनाम एम.आर. अप्पाराव' का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जब कोई सार्वजनिक प्राधिकरण अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहता है, तो अदालत धारा 226 के तहत परमादेश जारी करने के लिए बाध्य है। 

'बाबा ज्ञानदास बनाम तहसीलदार श्योपुर (2018 RN 185)' के फैसले के तहत तय किया गया कि बिना वैध भूमिस्वामी अधिकार वाले व्यक्ति को सीमांकन कार्यवाही में पक्षकार बनने या आपत्ति जताने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। 

भूमि की परिभाषा व अतिक्रमण: 
'नारायण व्यंकटराव बनाम नगुबाई बालाजी (1977 MPLJ 578)' एवं 'मुरलीधर बनाम राजस्व मंडल' का उल्लेख करते हुए कहा गया कि भू-राजस्व संहिता की धारा 250 के तहत जमीन पर बने अवैध मकानों को हटाने का अधिकार तहसीलदार के पास है और अवैध निर्माण करने वाले नगर निगम अधिनियम की धारा 299 व 308 के तहत संरक्षण के हकदार नहीं हैं। 

न्यायालय का अंतिम आदेश
W.P. No. 18150/2024 (स्वीकार): एसडीओ का विवादित आदेश दिनांक 11.03.2024 निरस्त किया गया। राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि वे 30 दिनों के भीतर सर्वे नंबर 66/2(क) से समस्त अतिक्रमणों को हटाकर मेसर्स श्रीराम बिल्डर्स को खाली कब्जा सौंपें। 

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