इंदौर, 28 अक्टूबर 2026: नगर निगम के महापौर पुष्यमित्र भार्गव और कमिश्नर श्रीक्षित सिंघल, हर रोज जनता को आदर्शवाद का पाठ पढ़ाते दिखाई देते हैं लेकिन नगर निगम इंदौर में अधिकारियों ने मनमानी करके आतंक मचा रखा है। कानून की जिन धाराओं को 2020 में रद्द कर दिया गया, उनके आधार पर केस बनाकर अस्पताल संचालक को परेशान किया गया। हाईकोर्ट ने ऐसे बेवकूफ अधिकारी पर एक लाख का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही नगर निगम इंदौर (मतलब महापौर और कमिश्नर) को भी फटकार लगाई है।
मेसर्स बाफना हॉस्पिटल बनाम इंदौर नगर निगम
यह विवाद मेसर्स बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड (M/s Bafgna Hospital and Orthopedics Research Centre Pvt Ltd) बनाम इंदौर नगर निगम एवं अन्य (रिट याचिका संख्या: WP 44683 / 2026, CNR No.: MPHC020428692026) से संबंधित है। बाफना हॉस्पिटल प्रबंधन ने इंदौर नगर निगम द्वारा पारित 30 सितंबर 2026 के विवादित आदेश और उसके आधार पर तैयार 7 अक्टूबर 2026 की लेजर रिपोर्ट के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता बाफना हॉस्पिटल की ओर से अधिवक्ता श्री विभोर खंडेलवाल तथा अधिवक्ता श्री जयेश गुरनानी ने पैरवी की। वहीं, इंदौर नगर निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनोज मुंशी, अधिवक्ता श्री शशांक श्रीवास्तव एवं अधिवक्ता श्री विक्रम मालवीय प्रस्तुत हुए। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नगर निगम के संबंधित अधिकारी ने आदेश जारी करते समय नगर निगम अधिनियम (Municipal Corporation Act) की धारा 143, 146 और 153 का सहारा लिया था। आश्चर्यजनक बात यह थी कि ये तीनों धाराएं राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2020 में ही निरसित (omitted/repealed) कर दी गई थीं। कानून में अस्तित्वहीन हो चुकी धाराओं के बल पर आदेश जारी होने के कारण अस्पताल प्रशासन को न्याय की गुहार लगाने के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
अदालत में सुनवाई और नगर निगम का बैकफुट पर आना
हाईकोर्ट द्वारा 26 अक्टूबर 2026 को दिए गए पूर्व आदेश के अनुपालन में 28 अक्टूबर 2026 को इंदौर नगर निगम के सहायक राजस्व अधिकारी (एआरओ - विधि) श्री मनोहर विश्वकर्मा व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए। मामले की सुनवाई के दौरान जब कानूनी खामियों और निरसित धाराओं का मुद्दा उठा, तो नगर निगम के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनोज मुंशी ने उपस्थित अधिकारी से निर्देश लेकर अदालत में स्वीकार किया कि निगम प्रशासन इस आदेश को वापस ले रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि 30 सितंबर 2026 का मूल आदेश और 7 अक्टूबर 2026 की लेजर रिपोर्ट कानून की दृष्टि से पूरी तरह अमान्य (bad in law) और अस्तित्वहीन (non-est) है।
हाईकोर्ट ने नगर निगम इंदौर को फटकार लगाई
नगर निगम द्वारा आदेश वापस लेने के बयान पर माननीय न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट ने राहत तो दी, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के इस ढुलमुल रवैये पर गहरी पीड़ा और नाराजगी जताई। अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया, नगर निगम जैसी वैधानिक संस्थाओं के अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे कानून के दायरे में रहकर और मौजूदा नियमों के अनुसार ही किसी विवाद का निपटारा करें। 2020 में विलोपित हो चुकी धाराओं का उपयोग करना अधिकारी की घोर अज्ञानता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर करता है।
बिना विवेक का इस्तेमाल किए (non-application of mind) यांत्रिक तरीके से आदेश पारित करना अधिकारों का दुरुपयोग है, जिसके कारण याचिकाकर्ता को बेवजह मुकदमेबाजी में घसीटा गया और अदालत का बहुमूल्य समय नष्ट हुआ।
सहायक राजस्व अधिकारी मनोहर विश्वकर्मा पर एक लाख का जुर्माना
हाईकोर्ट ने भविष्य में सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक धन के बल पर लापरवाह मुकदमेबाजी पर अंकुश लगाने और मिसाल पेश करने के लिए 1,00,000 रुपये का जुर्माना ठोका।
₹75,000 (पिचहत्तर हजार रुपये): मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, इंदौर (M.P. Legal Services Authority, Indore) के खाते में जमा कराने का आदेश।
₹25,000 (पच्चीस हजार रुपये): याचिकाकर्ता (बाफना हॉस्पिटल) को मुकदमे के खर्च (litigation cost) के रूप में भुगतान करने का आदेश।
दोषी अधिकारी की जेब से होगी 1 लाख की वसूली
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने स्पष्ट आदेश दिया कि इंदौर नगर निगम के उच्चतम अधिकारी (आयुक्त/शीर्ष प्रबंधन) इस पूरे मामले की समीक्षा करेंगे और जुर्माने की यह राशि (₹1,00,000) गड़बड़ी करने वाले संबंधित अधिकारी (Erring Officer) से वसूल करेंगे। कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि इस हर्जाने का आर्थिक बोझ नगर निगम या जनता के खजाने पर बिल्कुल नहीं पड़ना चाहिए। वसूली की यह प्रक्रिया जुर्माना जमा होने के 15 दिनों के भीतर पूर्ण करने के आदेश दिए गए हैं। रिपोर्ट: ललित मुद्गल; एडिटर: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।

