करवा चौथ 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और विशेष परंपरा

Updesh Awasthee
धर्म एवं ज्योतिष न्यूज डेस्क, 28 अक्टूबर 2026
: भारतीय संस्कृति में करवा चौथ (कर्क चतुर्थी) का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अटूट प्रेम, त्याग, निष्ठा और समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक है। इस पावन अवसर पर महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र, निरोगी काया और अखंड सौभाग्य के लिए सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक अन्न और जल का त्याग कर 'निर्जला व्रत' रखती हैं। यदि आप भी वर्ष 2026 में इस व्रत की तैयारी कर रही हैं, तो आइए जानते हैं इस पर्व से जुड़ी पंचांग की सटीक तिथियां, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और विशेष परंपराओं की विस्तृत जानकारी। 

करवा चौथ 2026: सटीक पंचांग व शुभ मुहूर्त

पंचांग और स्थानीय तिथि गणना के अनुसार, इस वर्ष करवा चौथ पर पूजा और अर्घ्य के लिए निम्नलिखित समय शुभ रहेगा:
• करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल): शाम 05:41 PM से रात 07:07 PM तक (पूजा की कुल अवधि: 01 घंटा 16 मिनट)
• करवा चौथ व्रत का कुल समय: सुबह 06:30 AM से रात 08:39 PM तक (व्रत की कुल अवधि: 14 घंटे 09 मिनट)
• चंद्रोदय (चांद निकलने का समय): रात 08:39 PM
• चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 अक्टूबर 2026 को तड़के (सूर्योदय से पूर्व) 01:06 AM बजे
• चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर 2026 को रात 10:09 PM बजे 
• व्रत का समय: सुबह 06:31 बजे से रात 08:17 बजे तक
• पूजा एवं कथा का शुभ मुहूर्त: शाम 05:38 बजे से शाम 06:56 बजे तक
• सरगी का समय: सुबह 03:30 बजे से 05:30 बजे के बीच

करवा चौथ 2026 के तीनों शुभ मुहूर्त

शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार करवा चौथ का शुभ मुहूर्त मुख्य रूप से तीन प्रमुख समयों में विभाजित रहता है:
1. ब्रह्म मुहूर्त (सरगी एवं संकल्प): सूर्योदय से पूर्व सास द्वारा दी गई सरगी खाकर निर्जला व्रत का संकल्प लिया जाता है।
2. प्रदोष काल (सायं कालीन मुख्य पूजा): सूर्यास्त के बाद का समय, जिसमें चौथ माता/पार्वती जी, शिव जी, गणेश जी व कार्तिकेय जी का पूजन, करवा फेरना और व्रत कथा का आयोजन होता है।
3. चंद्रोदय काल (चंद्रदर्शन एवं अर्घ्य): रात्रि में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा और उसके पश्चात पति के दर्शन कर अर्घ्य दिया जाता है तथा व्रत का पारण होता है।

क्यों कई क्षेत्रों में छलनी से चांद देखना वर्जित माना जाता है?

आम तौर पर देश के अधिकांश हिस्सों में यह चलन है कि महिलाएँ छलनी से चांद और फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। लेकिन, राजस्थान के कई पारंपरिक क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों में छलनी से चांद को देखना उचित या शुभ नहीं माना जाता है। 

वहाँ की लोक-मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा को एक देवता और 'चंदा मामा' के रूप में पूजा जाता है। राजस्थान के कई समाजों में यह परंपरा है कि महिलाएँ बिना किसी आवरण या छलनी के सीधे खुले आसमान के नीचे चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और अपनी सीधी दृष्टि चंद्रमा पर डालती हैं। इसके पीछे यह भाव निहित है कि छलनी जैसी छिद्रयुक्त वस्तु से चंद्रमा को देखना उसे खंडित रूप में देखने या अशुभ दृष्टि डालने जैसा है। इसलिए, वहाँ सुहागिनें सीधे चंद्र दर्शन कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। 

करवा चौथ और सिनेमा: पर्दे ने कैसे बदल दी इस पर्व की लोकप्रियता?

आज करवा चौथ का जो भव्य, रंगीन और उत्सवधर्मी स्वरूप देश-विदेश में देखने को मिलता है, उसे लोकप्रिय बनाने में भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) का बहुत बड़ा योगदान रहा है। मूल रूप से करवा चौथ मुख्य रूप से उत्तर भारत (विशेषकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान) के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित एक क्षेत्रीय व्रत हुआ करता था। लेकिन 90 के दशक की फिल्मों ने इसे एक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान दिलाई। यश चोपड़ा और सूरज बड़जात्या जैसे फिल्मकारों ने करवा चौथ के दृश्यों को बेहद भव्य, जादुई और भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया। 

चमकीले लाल जोड़े, हाथों में रची गाढ़ी मेहंदी, सोलह श्रृंगार, छलनी से चांद का दीदार और पति-पत्नी का यह प्रेमपूर्ण संवाद, इन सभी दृश्यों ने इस व्रत को एक बेहद खूबसूरत और रोमांटिक उत्सव के रूप में स्थापित कर दिया। फिल्मों के प्रभाव के कारण ही अब यह व्रत देश के उन अन्य राज्यों और समुदायों में भी धूमधाम से मनाया जाने वाला एक आधुनिक पर्व बन चुका है। 

करवा चौथ पूजा सामग्री की संपूर्ण सूची

पूजन की सुगमता के लिए सामग्री को प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है:
1. पूजा स्थल एवं करवा माता सामग्री: 
करवा माता की तस्वीर या गौर माता की मूर्ति (या पीली मिट्टी/गेरू), मिट्टी या धातु के 2 करवे (ढक्कन और सींक सहित), पूजा की चौकी, लाल वस्त्र, तांबे या पीतल का कलश, जल, गंगाजल, अखंडित चावल (अक्षत), रोली, चंदन, हल्दी, कुमकुम, धूप, दीप, कपूर, माचिस, देसी घी, रुई की बत्तियां, फूल, फूलमाला, शमी/दूर्वा, मिष्ठान्न, पान का पत्ता, सुपारी, लौंग और इलायची।

2. सरगी की सामग्री: 
फेनियां, ताजे फल, सूखे मेवे (काजू, बादाम, किशमिश), नारियल, मिठाई और श्रृंगार का सामान।

3. सोलह श्रृंगार (सुहाग पिटारी): 
सिंदूर, काजल, बिंदी, मेहंदी, अलता/महावर, लाल चूड़ियां, पायल, बिछिया, कुंकुम, इत्र, मांग टीका, नथ, झुमके और सुहाग का जोड़ा। 

4. चंद्रदर्शन सामग्री: 
पूजा की छलनी, अर्घ्य देने का लोटा (जल, दूध, अक्षत व पुष्प सहित), और पारण हेतु जल व मिठाई।

करवा चौथ की संपूर्ण पूजा विधि एवं विशेष नियम

सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सास द्वारा दी गई सरगी का सेवन करें और दिनभर निर्जला व्रत का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त में घर के मंदिर या साफ-सुथरे स्थान पर दीवार पर करवा माता या गौर-गणेश स्थापित करें। कोरे करवे में जल भरकर उसमें सिक्के और अक्षत डालें। मां पार्वती, शिवजी, गणेश जी और कार्तिकेय जी की विधि-वत पूजा करें।
सायं काल की कथा सुनते समय स्त्रियाँ एक गोल घेरे में बैठकर आपस में सात बार करवा बदलती हैं और पारंपरिक मंगल गीत गाती हैं। हाथ में चावल के दाने लेकर वीरावती की कथा श्रद्धापूर्वक सुनें। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें। अपनी स्थानीय परंपरा (सीधे या छलनी से) के अनुसार चांद और फिर अपने पति का चेहरा देखें। पति के हाथों जल ग्रहण कर अपना निर्जला व्रत संपन्न करें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

करवा चौथ की पौराणिक कथा, रानी वीरावती की कथा

शास्त्रों में वर्णित वीरावती और उसके सात भाइयों की कथा इस प्रकार है:
प्राचीन काल में एक वेद शर्मा नामक ब्राह्मण के सात पुत्र और एक गुणवती पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। वीरावती का विवाह एक राजा के साथ हुआ था। विवाह के बाद जब वीरावती अपने मायके आई, तो उसने अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा। 

दिनभर निर्जल रहने के कारण भूख और प्यास से वीरावती अत्यंत व्याकुल हो गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसके सात भाई अपनी लाडली बहन की यह दुर्दशा देख नहीं पा रहे थे। वे जानते थे कि वीरावती चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना जल ग्रहण नहीं करेगी। इसलिए भाइयों ने बहन का व्रत तुड़वाने के लिए एक युक्ति सोची। उन्होंने दूर एक वट के वृक्ष के पीछे दीपक जलाकर छलनी की ओट में रख दिया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे क्षितिज पर पूर्ण चंद्रमा निकल आया हो। 

वीरावती ने उस नकली चंद्रमा को देखकर अपना व्रत खोल लिया, जिससे उसके पति के प्राण संकट में पड़ गए। बाद में अपनी भूल का अहसास होने पर वीरावती ने पुनः विधि-विधान से माता पार्वती और गणेश जी की पूजा की और कठोर व्रत किया, जिससे उसकी निष्ठा देखकर देवी-देवताओं ने उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया। तभी से यह पर्व पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

प्रेम, विश्वास और अटूट बंधन का उत्सव

करवा चौथ केवल एक उपवास या धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह दो आत्माओं के बीच के उस पवित्र और अटूट विश्वास का उत्सव है जो समय की हर कठिन परिस्थिति में भी मजबूत बना रहता है। सुबह की पहली किरण के साथ शुरू होने वाला यह निर्जला व्रत और रात के आकाश में चंद्र दर्शन के साथ पूरा होने वाली यात्रा पति-पत्नी के परस्पर प्रेम, समर्पण और एक-दूसरे के प्रति अगाध आदर को दर्शाती है।

चाहे वह आधुनिक चकाचौंध से भरी फिल्मी स्क्रीन हो, पीढ़ियों से चली आ रही लोक-परंपराएं हों या फिर रिश्तों को सींचने वाला त्याग, करवा चौथ हर साल सुहागिनों के जीवन में नई उम्मीद, मिठास और खुशियों का नया संदेश लेकर आता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम और निष्ठा हर कठिनाई को पार कर जीवन को सुखी और मंगलमय बना सकती है। प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

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