सनातन धर्म में नान्दी श्राद्ध का महत्व

Updesh Awasthee
सनातन धर्म में वैदिक काल से यह परम्परा रही है कि परिवार में किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ करने के पूर्व नान्दी श्राद्ध किया जाता है। कोई भी शुभ कार्य यथा विवाह, उपनयन, नूतन गृह प्रवेश, मुंडन आदि शुभ कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व नान्दी श्राद्ध करना अनिवार्य माना गया है। वर्तमान समय में भी यह परम्परा जीवित है। महाराजा दशरथजी ने श्रीराम जन्म के उपरान्त अयोध्या में विधिपूर्वक नान्दी श्राद्ध किया था। श्रीरामचरितमानस में महाकवि गोस्वामी तुलसीदासजी लिखते हैं-
''नन्दी मुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।
(श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड दोहा-१९३)

नान्दी श्राद्ध के कई नाम हैं- यथा- वृद्धि श्राद्ध, बड़ श्राद्ध तथा अभ्युदयिक श्राद्ध। श्रीरामचरितमानस के अनुसार श्राद्ध करने के पश्चात् ब्राह्मणों को सोना, गाय, मणि, वस्त्र आदि दान देने की परम्परा भी प्रचलित थी। इस श्राद्ध का उद्देश्य परिवार के पितृगणों को प्रसन्न करना रहता है। इसको करने से सभी पितृगणों का आशीर्वाद हमें प्राप्त होता है। पितृपक्ष और मातृपक्ष के पितरों का नाम स्मरण कर उनका पूजन अर्चन किया जाता है और उन्हें आशीर्वाद ग्रहण करने के पश्चात् विसर्जित किया जाता है। जिन परिवारों में दोनों पक्षों का वंश वृक्ष बना कर रखा जाता है, वहाँ पितृगणों का स्मरण करना आसान होता है, अत: परिवार में वंश वृक्ष होना आवश्यक होता है। सर्वप्रथम पारिवारिक शुभ कार्य में गणेश पूजन करने के पश्चात् नान्दीमुख श्राद्ध सम्पन्न किया जाता है।

यह श्राद्ध पवित्र होता है। इसमें यज्ञोपवीत को सव्य स्थिति में ही धारण किए हुए रहना पड़ता है। इस पूजन में श्वेत पुष्पों का अधिक महत्व होता है। पूजन सामग्री में काले तिल के स्थान पर जौ (यव) का प्रयोग किया जाता है। अन्य सामग्री में कंकू, चंदन, हल्दी, अक्षत, गुलाल, अबीर आदि का प्रयोग किया जाता है। धूप, दीप भी आवश्यक है। दीप आरती के पश्चात् कर्पूर आरती भी की जाती है। चावल के पिंड पीले रंग के चावल से बनाते हैं। पारिवारिक सदस्य पूजन करके पैर छूते हें और विसर्जन किया जाता है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा दशरथजी बारात लेकर राजा जनक के यहाँ मिथिला पधारते हैं। उन्हें जनवासे में विश्रामगृह में ठहराया जाता है। स्वागत सत्कार के पश्चात राजा जनक महाराज दशरथ से कहते हैं-
''रामलक्ष्मणयो राजन गोदानं कारयस्वह।
पितृ कार्यं च भद्रं ते ततो वैवाहिकं कुरु।।
(वाल्मीकिरामायण-बालकाण्ड सर्ग ७१-२३)
अर्थात्- राजा जनक ने महाराजा दशरथ से कहा- राजन्!  अब आप श्रीराम और लक्ष्मण के लिये इनसे गोदान करवाइये। आपका कल्याण हो। नान्दी मुख श्राद्ध कार्य भी सम्पन्न कीजिये।
राजा दशरथ भी कहते हैं-
''स्वस्ति प्राप्रुहि भद्रं ते गमिष्याम: स्वमालयम्।
श्राद्ध कर्माणि विधिवद्विधास्य इति चाब्रवीत।।
(वाल्मीकिरामायण- बालकाण्ड सर्ग ७२-१९)
अर्थात्- आपका कल्याण हो। आप मंगल के भागी हो। अब हम अपने विश्राम स्थल जाएंगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुख श्राद्ध का कार्य सम्पन्न करूँगा।

नान्दीमुख श्राद्ध में पितृपक्ष की तीन पीढ़ियों और मातृपक्ष की तीन पीढ़ियों का स्मरण किया जाता है। तीनों पीढ़ियों के पितृओं का नाम लेकर उनका पूजन किया जाता है। अनायास, अनजाने में कोई त्रुटि हो गई हो तो उनसे क्षमा याचना की जाती है। उनसे आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जिस कार्य के लिये नान्दीमुख श्राद्ध किया जाता है, उस कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने की प्रार्थना पितृगणों से की जाती है। शुभ कार्य में कोई विघ्न बाधा न आए और सुखपूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक कार्य सम्पन्न हो जाए यही इस नान्दीमुख श्राद्ध का उद्देश्य होता है।

नान्दीमुख श्राद्ध कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् महाराजा दशरथजी और राजा जनकजी ने सुवर्ण, गौ आदि का दान करने का वर्णन प्राप्त होता है। वर्तमान में भी श्राद्धकर्ता अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करता है।

वर्तमान में ही नहीं वाल्मीकिकालीन ग्रंथ में भी इसका वर्णन प्राप्त होता है। हमारी नवागत पीढ़ी भी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे। उन्हें सदैव दोनों पक्षों के पितृगणों का सतत आशीर्वाद प्राप्त होता रहे और वे भी अपने जीवन के शुभ कार्यों के पूर्व नान्दी श्राद्ध करने की परम्परा का निर्वहन करते रहें, जिससे उनके सभी शुभ कार्य सानन्द सम्पन्न हों और उनका जीवन सुगमतापूर्वक निर्बाध गति से चलायमान रहे। नई पीढ़ी भी शुभता के भावों के साथ इस सनातन परम्परा के माध्यम से अपने जीवन को सुखी-समृद्ध बना सकती है।
लेखक: डॉ. शारदा मेहता, ऋषिनगर, उज्जैन (म.प्र.)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!