भोपाल, 1 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश की स्कूल शिक्षा व्यवस्था गजब है, और स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारी कर्मचारी, मतलब गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो जाने वाला काम करते हैं। सागर में एक हायर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल ने पार्किंग में पांच शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी। यहां उल्लेख करना अनिवार्य है कि पार्किंग व्यवस्था का संचालन करना चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का काम होता है।
Teachers have been assigned to parking lot duty in Madhya Pradesh
मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल है। नाम है ...। दिनांक 30 सितंबर 2026 को प्रिंसिपल के हस्ताक्षर से एक आदेश जारी किया गया। यह आदेश, समाचार के साथ संलग्न है। एक सादा नोटबुक पर हस्तलिखित आदेश में लिखा है कि, विद्यालय के समस्त स्टाफ को सूचित किया जाता है की संपूर्ण विद्यालय की पार्किंग व्यवस्था (साइकिल, टू व्हीलर, फोर व्हीलर इत्यादि) हेतु निम्नांकित शिक्षकों को प्रभारी नियुक्त किया जाता है:-
- श्री प्रियेश चौरसिया प्रभारी नंबर 1
- श्री मनीष वर्मा प्रभारी नंबर 2
- श्री राम कुमार पटेल सहयोगी।
- श्री मनोहर यादव सहयोगी।
- श्री भूपत लोधी सहयोगी।
- श्री कुंदन गोड सहयोगी।
प्रिंसिपल ने आदेशित किया है कि आप सभी प्रतिदिन निर्धारित स्थान पर उक्त वाहनों की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। हमारे पास आदेश की जो कॉपी प्राप्त हुई है उसमें शिक्षक श्री राम कुमार पटेल और श्री भूपत लोधी ने इस आदेश को स्वीकार भी कर लिया है। चलिए अब कुछ नियम कानून की बातें करते हैं:-
प्रिंसिपल को यह अधिकार किसने दिया कि वह शिक्षकों की ड्यूटी कक्षा के अलावा कहीं भी लगा सकते हैं, और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के स्थान पर भी लगा सकते हैं। प्रिंसिपल के अधिकार और कर्तव्यों में यह बात कहां पर लिखी है। प्रिंसिपल होने का मतलब स्कूल का मालिक हो जाना नहीं होता, और स्कूल के अन्य कर्मचारी उसके अधीनस्थ होते हैं, गुलाम नहीं होते।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार; शिक्षक को अध्यापन के लिए प्रशिक्षित किया गया है। ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर को इलाज के लिए और पुलिस को सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए किसी भी राज्य का मुख्य सचिव अथवा अन्य कोई भी अधिकारी (चुनाव एवं राष्ट्रहित में अति आवश्यक होने की स्थिति में) के अलावा किसी भी काम के लिए शिक्षकों की ड्यूटी नहीं लग सकता है। यहां तक की सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी नहीं लग सकता है।
शर्म की बात यह है कि, एक तरफ प्राचार्य को अपनी लिमिट नहीं पता और दूसरी तरफ 4 में से दो शिक्षक उसका आदेश स्वीकार भी कर रहे हैं। जबकि मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम के अनुसार इस प्रकार का कोई भी आदेश स्वत: ही शून्य होता है।
प्रिंसिपल को ऐसे आदेश के लिए समस्त स्टाफ को सूचित करते हुए क्षमा याचना करना चाहिए। अन्यथा उनके खिलाफ शिक्षकों से बंधुआ मजदूरी करने हेतु दबाव बनाने का मामला बन सकता है। प्राचार्य के इस आदेश में तो किसी वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति भी शामिल नहीं है। ऐसे आदेश को न्यायालय में "मनमानी" प्रमाणित करने के लिए ज्यादा समय नहीं लगेगा।
यह मानहानि का मामला भी है। आदेश में जितने भी शिक्षकों का नाम लिखा हुआ है उनमें से कोई भी एक या फिर सब मिलकर प्रिंसिपल के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज करवा सकते हैं जिसमें 3 साल जेल का प्रावधान है।

