आकाशगंगाओं में प्रलय कैसे आती है, अमेरिका में हुई रिसर्च का भारतीय ज्योतिष और महाकालेश्वर से कनेक्शन

Updesh Awasthee
ज्ञान विज्ञान न्यूज डेस्क, 3 अक्टूबर 2026:
भारतीय परंपराओं में अंतरिक्ष का अध्ययन, बहुत प्राचीन विषय है। ब्रिटिश शासन ने हमारे डॉक्यूमेंट को स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह उनके नियमों के अनुसार नहीं लिखे गए थे, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भारतीय विशेषज्ञों का अध्ययन सही नहीं था। भारत में पृथ्वी पर प्रलय का कारण और वर्णन मिलता है, कुछ विद्वान इसे काल्पनिक कहानी कहा करते थे। आज पश्चिम के वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है कि आकाशगंगाओं में प्रलय कैसे आती है। जबकि आकाशगंगा इतनी विशाल होती है कि उसमें करोड़ों सूर्य होते हैं, तो फिर उसको कौन और कैसे खत्म कर देता है। उम्मीद है वैज्ञानिक और अध्ययन करेंगे एवं वहां तक भी पहुंचेंगे जहां भारतीय विशेषज्ञ पहुंच गए थे और "पृथ्वी पर प्रलय" डॉक्यूमेंट कर गए थे। 

वैज्ञानिकों की टीम और रिसर्च का टॉपिक

'द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' (The Astrophysical Journal Letters) में एक रिसर्च रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। जिसको मुख्य रूप से डॉ. नम्रता रॉय (Dr. Namrata Roy), रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI), बेंगलुरु और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी (ASU) द्वारा लिखा गया है। टीम में इनके साथ प्रो. संचयीता बोरठाकुर, प्रो. टिमोथी हेकमैन, जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी अमेरिका एवं तन्मय सिंह, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका शामिल थे। इन सभी ने रिसर्च करके यह पता लगाया है कि, ट्रिलियन मील दूर मौजूद छोटा सा ब्लैक होल हमारी अपनी उत्पत्ति और आकाशगंगाओं के विकास को कैसे प्रभावित करते हैं। 

अमेरिका में हुई रिसर्च से भी भारतीय वैदिक ज्योतिष की पुष्टि हुई

रिसर्च में बताई जाएगी आकाशगंगा की केंद्र में एक ब्लैक होल होता है। आकाशगंगा की तुलना में इसका आकार बहुत छोटा होता है लेकिन एक समय ऐसा आता है जब ब्लैक होल के अंदर से अत्यधिक तीव्र ऊर्जा वाले प्लाज्मा जेट बाहर निकलने लगते हैं। ये जेट गैलेक्सी की सीमाओं को पार करके दूर CGM तक पहुंच जाते हैं और वहां मौजूद गैस के तापमान और दबाव में उथल-पुथल मचा देते हैं। इसके परिणामस्वरूप, गैस ठंडी होकर जम नहीं पाती और नए तारों का बनना पूरी तरह बंद हो जाता है। 

आपको ध्यान में आएगा कि भारत में अंतरिक्ष के अध्ययन के दौरान "ज्योतिष शास्त्र" नाम की एक रिसर्च रिपोर्ट में बहुत सटीक तरीके से बताया गया है कि कैसे लाखों और करोड़ों किलोमीटर दूर कोई ग्रह हमारे जीवन को प्रभावित करता है। 

जो आपको टेलिस्कोप से भी नहीं दिखता, वह भी कितना शक्तिशाली होता है

रिसर्च के दौरान डॉक्टर नम्रता राय की टीम ने 90,228 रेडियो गैलेक्सी के शुरुआती नमूनों में से 324 ऐसी आकाशगंगाओं का चयन किया, जिनके पीछे दूर स्थित क्वासरों (quasars) की प्रकाश किरणें उनके सिरकमगैलेक्टिक मीडियम से होकर गुजर रही थीं। स्पेक्ट्रा को आपस में जोड़ने वाली तकनीक (stacking background-quasar spectra) का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने इतनी धुंधली गैस का पता लगाया जिसे सामान्यतः देखना लगभग असंभव था। 

ऋग्वेद से लेकर श्रीमद्भागवत महापुराण तक यही बात कई बार दोहराई गई है कि, ब्रह्मा विष्णु महेश इत्यादि इतनी धुंधली गैसों को नियंत्रित करने में सक्षम है जिनको मनुष्य महसूस भी नहीं कर पाते हैं और देवता सिर्फ देख पाते हैं। 

राहु और केतु आपके जीवन पर किस प्रकार असर डालते हैं

भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि राहु और केतु नाम के दो ग्रह, जो दिखाई नहीं देते, लेकिन पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करते हैं। केवल पृथ्वी के जीवन को नहीं बल्कि निजी तौर पर आपके जीवन को भी प्रभावित करते हैं। अमेरिका में हुई रिसर्च, इस बात को भी सपोर्ट कर जाती है। 

शोधकर्ता नम्रता रॉय बताती हैं कि एक ब्लैक होल सौरमंडल के बराबर आकार का हो सकता है, जबकि गैलेक्सी उससे लाखों गुना विशाल होती है; फिर भी ब्लैक होल का जेट लाखों प्रकाश-वर्ष दूर तक असर डालता है। अध्ययन में पाया गया कि जेट से निकलने वाली ऊर्जा पूरे CGM में एक समान नहीं फैलती, बल्कि जेट की दिशा (radio-jet axis within 20 degrees) में ही केंद्रित रहती है। जेट की सीध वाली दिशा में हाइड्रोजन गैस की चमक (Hα emission) सामान्य स्टार-फॉर्मिंग गैलेक्सी के हेलो (halo) की तुलना में 100 गुना (1 से 2 ऑर्डर ऑफ मैग्नीट्यूड) अधिक पाई गई। जब शोधकर्ताओं ने सभी दिशाओं (azimuthal angles 0 to 90 degrees) के औसतन डेटा को देखा, तो कोई खास संकेत नहीं मिला, जिससे साबित होता है कि जेट का प्रभाव अत्यधिक दिशात्मक (anisotropic) होता है। 

रिसर्च से स्पष्ट होता है कि, जेट (अर्थात ग्रहों की दृष्टि) हैलोजन लाइट की तरह नहीं होती बल्कि लेजर लाइट से भी ज्यादा सटीक होती है। यही कारण है कि पृथ्वी पर मौजूद लगभग 700 करोड लोगों में से सिर्फ आपको प्रभावित करती है। 

प्रलय के केंद्र कितने शक्तिशाली होते हैं और इनका नियंत्रण कितना अनिवार्य है

भारतीय परंपरा में, ज्योतिर्लिंग पर निरंतर जल से अभिषेक के निर्देश दिए गए हैं। अब तक हमारी मान्यता थी कि, उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, पृथ्वी पर प्रलय का एक केंद्र हो सकता है। अमेरिका में हुई रिसर्च इस मान्यता को मजबूत करती है। 

रिसर्च रिपोर्ट में लिखा है कि, सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस विशाल गैस भंडार को चमकाने के लिए ब्लैक होल जेट की कुल यांत्रिक शक्ति (mechanical power) के मात्र 0.06% (10^-3 भाग) की ही आवश्यकता होती है। यानी ब्लैक होल अपनी ऊर्जा का एक बहुत छोटा सा हिस्सा इस्तेमाल करके भी विशालकाय आकाशगंगा की स्टार-फॉर्मेशन प्रक्रिया को रोक सकता है और उसके विकास को स्थायी रूप से बदल सकता है। 

अर्थात पृथ्वी पर जीवन को समाप्त करने के लिए एक छोटा सा ज्योतिर्लिंग काफी है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने 2026 में "आकाशगंगा में प्रलय किस प्रकार आती है, कहां से आती है और किस प्रकार पूरी आकाशगंगा में जीवन समाप्त हो जाता है।" इसकी खोज की है जबकि श्रीमद्भागवत महापुराण 12.4 में प्रलय का विस्तार से वर्णन दिया गया है। यहां तक बताया गया है कि एक आकाशगंगा, जिसके अंदर अरबो सूर्य हैं, लाखों सौरमंडल हैं (यदि आप पृथ्वी पर मौजूद सबसे बड़ी दीवार पर आकाशगंगा का चित्र बनाते हैं तो, पृथ्वी एक सुई की नोक के बराबर होगी), तब केवल किसी एक ग्रह अथवा पृथ्वी पर प्रलय किस प्रकार आती है। सिर्फ इतना ही नहीं, यह भी बताया गया है कि, प्रलय की स्थिति से बचने के लिए क्या करना होगा, और यदि फिर भी पहले आ जाए तो जीवन की रक्षा कैसे करें। कॉपीराइट: श्यामला ज्योतिष पीठ, भोपाल।

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