भोपाल, 22 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश में किसानों का एक वर्ग पावरफुल हो गया है और "जय किसान" संवेदनशील नारे का उपयोग अपने फायदे के लिए करने लगा है। सब जानते हैं कि, भोपाल के लिए तालाब कितना जरूरी है लेकिन कुछ किसानों का कहना है कि, तालाब से ज्यादा खेती जरुरी है। वह तालाब के लिए आरक्षित की गई जमीन पर खेती का अधिकार मांगने प्रदर्शन कर रहे हैं।
भोपाल का तालाब लालची करोड़पतियों का शिकार
भोपाल का तालाब, कई प्रकार के शक्तिशालियों का शिकार हो रहा है। तालाब को रामसर साइट घोषित किया गया है लेकिन मध्य प्रदेश शासन का पर्यटन विभाग, तालाब से पैसा कमाना चाहता है। इसलिए प्रतिबंध होने के बावजूद मोटर बोट का संचालन एवं अन्य गतिविधियां करने की कोशिश करता रहता है। NGT कई बार कठोर निर्देश दे चुका है लेकिन नगर निगम के रिश्वतखोर अधिकारियों ने तालाब की जमीन पर रेजिडेंशियल और कमर्शियल निर्माण होने दिए। जब-जब ऑर्डर होता है तब-तब JCB से किसी की बाउंड्री या किसी का फर्ज तोड़कर मीडिया में फोटो वीडियो शेयर कर दिए जाते हैं। खबर छप जाती है, कार्रवाई हुई, लेकिन बिल्डिंग सीना तानकर खड़ी रहती है। मतलब हर कोई तालाब से पैसा बनाने की कोशिश कर रहा है। तालाब को बनाए रखने की कोशिश करने वालों की संख्या भोपाल में बहुत कम हो गई है।
किसान: अपने फायदे के लिए तालाब का नुकसान
बिल्डर और टूरिज्म वालों को तो मान लेते हैं कि वह पैसे के लालची होते हैं लेकिन किसानों के बारे में कहा जाता है कि वह बड़े संवेदनशील होते हैं। यदि कोई चिड़िया अंडा दे दे तो किस उतने खेत में बुवाई नहीं करते, लेकिन शायद वह किसान कोई और होते होंगे। आजकल भोपाल में कुछ किसान अपने फायदे के लिए तालाब का नुकसान करने पर तुले हुए हैं। वह प्रदर्शन कर रहे हैं। भीड़ के कारण नेता और मीडिया उनकी और आकर्षित हो रहे हैं। भोपाल के नए मास्टर प्लान में तालाब के आसपास की जमीन को भोजताल संरक्षण जोन-1 (BIZ-1) और जोन-2 (BIZ-2) घोषित किया गया है। किसानों का कहना है कि 1995 में इस जमीन को खेती के लिए घोषित किया गया था। इसलिए अब जमीन को तालाब के लिए आरक्षित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने भड़का दिया यह समझ नहीं पाए
जबकि हर शिक्षित व्यक्ति जानता है कि भोपाल का रेजिडेंशियल एरिया लगातार बढ़ रहा है। आपके ट्यूबवेल में पानी के लिए तालाब का क्षेत्रफल, रेजिडेंशियल एरिया के क्षेत्रफल के अनुपात में बढ़ाना जरूरी है। नहीं तो लोगों की ट्यूबवेल में पानी नहीं आएगा। भोपाल में पेयजल संकट छा जाएगा। 66 गांव के 6000 किसानों के फायदे के लिए भोपाल के 36 लाख लोग पेयजल के लिए तरसेंगे। जनता को सब पता है लेकिन पब्लिक फेस्टिवल सीजन में व्यस्त है और पॉलीटिकल एजेंडा के तहत किसानों को भड़काकर प्रदर्शन करवाया जा रहा है। दुख की बात यह है कि कलेक्टर की टीम किसानों को समझा नहीं पा रही है।
क्या यह जमीन किसानों की है
प्रदर्शन करने वाले किसानों का कहना है कि 1995 में यह जमीन खेती के लिए थी, इसलिए इसका लैंडयूज चेंज नहीं किया जाना चाहिए। यह उनकी रोजी-रोटी का प्रश्न है। बयान काफी संवेदनशील लगता है लेकिन सबसे पहला सवाल यह है कि क्या यह जमीन किसानों की है?
किसानों के साथ धोखा किसने किया?
कांग्रेस पार्टी, किसानों की मांगों का समर्थन कर रही है लेकिन मजे की बात यह है कि सन 1978 में मोरारजी देसाई सरकार ने ही 44वां संविधान संशोधन करके, किसानों से उनके खेत के स्वामित्व का मूल अधिकार छीन लिया था। अब भारत में किसी भी किसान का खेत, उसकी नहीं बल्कि सरकार की संपत्ति है। सरकार जब चाहे किसान से उसका खेत वापस ले सकती है। मोरारजी देसाई सरकार के बाद भारत में लंबे समय तक (इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक) कांग्रेस की सरकार रही लेकिन किसी भी सरकार ने किसानों का संपत्ति का मूल अधिकार वापस नहीं किया। यदि कांग्रेस सरकार किसानों को संपत्ति का मूल अधिकार वापस कर देती, तो आज किसानों को प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।

