समाधान नहीं दे सकते तो जहर दे दो: बंदरों से परेशान ग्रामीणों ने कलेक्टर से कहा

Updesh Awasthee
भोपाल, 15 सितंबर 2026:
क्या ऐसा हो सकता है कि बंदरों ने, इंसानों को इतना परेशान कर दिया है कि वह अपने घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि कोई कलेक्टर, इंसानों को बंदरों के आतंक से बचाने में सफल न हो पाए और लोगों को कलेक्टर से यह कहना पड़े कि यदि आप समाधान नहीं कर सकते तो जहर दे दो। यह सब कुछ हो रहा है मध्य प्रदेश के मैहर जिले में। 

मैहर जिले के गांव इटमा खारा देवरा, बंदरों का आतंक

मैहर जिले में कलेक्टर का नाम है बिदिशा मुखर्जी (आईएएस)। लोग कहते हैं कि इनको इवेंट पसंद है, पब्लिक की परेशानियों को सुनना और उनको सॉल्व करने में ज्यादा रुचि नहीं लेती। अधीनस्थ अधिकारी जो कुछ सॉल्व कर दें, बस उतना ही क्रेडिट काफी है। मैहर जिले के गांव हैं इटमा खारा देवरा। यहां पर बंदरों का आतंक इतना अधिक है ग्रामीणों का जीना मुश्किल हो गया है। घर के बाहर कपड़े नहीं सुखा सकते, बर्तन नहीं रख सकते, बच्चों के खिलौने तो ठीक है बच्चे भी नहीं रह सकते। महिलाएं, वृद्धि और बच्चों का तो दिन में भी घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। पहले लाठी लेकर निकले तो डर जाते थे, अब तो लाठी से भी नहीं डरते। सबसे ज्यादा सहमत गरीबों की आती है। वह ग्रामीण जिनके कच्चे घर हैं। यह बंदर उनकी छत पर आकर बैठ जाते हैं और उनकी छत के "कवेलू" तोड़ देते हैं। 

हमारे पास बंदर पकड़ने के लिए बजट ही नहीं है

ग्रामीणों ने पंचायत में शिकायत की तो पंचायत में का हम कुछ नहीं कर सकते। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में शिकायत की तो उन्होंने बताया कि सरकार ने सन 2022 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में एक संशोधन कर दिया है। इसके कारण हम केवल काले मुंह के बंदरों को पकड़ सकते हैं। लाल मुंह के बंदरों को पकड़ने का काम ग्राम पंचायत करेगी। ग्रामीण वापस ग्राम पंचायत के पास गए तो पंचायत वाले बोलते हैं कि हमारे पास बंदर पकड़ने के लिए बजट ही नहीं है। 

जनसुनवाई और जन विश्वास में तो समस्या सुनती ही नहीं

कलेक्टर जिले का मुखिया होता है। कहते हैं जिस समस्या का समाधान किसी के पास नहीं होता, वह समाधान कलेक्टर के पास होता है लेकिन मैहर में कलेक्टर श्रीमती बिदिशा मुखर्जी को इवेंट पसंद है। लोगों की समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करने के लिए उनके पास समय नहीं होता है। पिछले मंगलवार को भी जनसुनवाई में मौजूद नहीं थी। मतलब समाधान तो दूर की बात जनता की सुनवाई तक नहीं करती है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत भी किसी समस्या का समाधान नहीं किया। किसी ग्राम पंचायत को ISO सर्टिफिकेट दिया। किसी लाभार्थी महिला को चेक दिया। जैसे जनसुनवाई में होता है वैसे ही जन विश्वास में भी हुआ। निकले अधिकारियों ने समस्याएं सुनी, नोट की ओर चले गए। 

इवेंट वेन्यू के दरवाजे पर आवेदन दिया

जब समस्या की सुनवाई के लिए कलेक्टर डायरेक्ट नहीं मिल पा रही थी तो लगभग 200 ग्रामीण एक कार्यक्रम के स्वागत द्वार पर जाकर खड़े हो गए। जैसे ही कलेक्टर मैडम आई, गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ने आवेदन दिया, समस्या बताई। कार्यक्रम स्थल पर भीड़ के सामने गांव के लोग खड़े थे, कलेक्टर मैडम ने आश्वासन लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों ने अपने आवेदन में लिखा है कि यदि उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता तो उनको इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी जाए। इन हालातो में जीवन बहुत मुश्किल हो गया है।

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