ग्वालियर, 10 सितंबर 2026: सामान्य जीवन में हम यह मानते हैं कि यदि धुआं उठा तो आग लगी ही होगी लेकिन भारत की न्याय प्रक्रिया कहती है कि इस प्रकार की मान्यता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मतलब यदि किसी सरकारी कर्मचारी का लंबा सर्विस रिकॉर्ड है, जो सर्विस बुक में दर्ज है, उसकी नियमित किया जा चुका है, उसको कई सालों तक सैलरी भी दी जा चुकी है लेकिन यदि उसके पास सिर्फ एक डॉक्यूमेंट नहीं है, तो वह सरकारी कर्मचारी नहीं है। उसको किसी भी समय बर्खास्त किया जा सकता है।
कृष्ण कुमार पालिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य: नियुक्ति को प्रमाणित करने वाले डॉक्यूमेंट
माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने कृष्ण कुमार पालिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (न्यूट्रल साइटेशन संख्या: 2026:MPHC-GWL:26831 / रिट याचिका क्रमांक 896/2025) के मामले में यह निर्णय सुनाते हुए याचिकाकर्ता की याचिका और याचिका संशोधन आवेदन (I.A. No. 12446/2026) दोनों को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद फैसला 31 अगस्त 2026 को सुरक्षित रखा था, जिसे 8 सितंबर 2026 को सुनाया गया।
मामले की पूरी कहानी और पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता कृष्ण कुमार पालिया का दावा था कि उन्हें 24 अप्रैल 1993 को पंप ड्राइवर के पद पर नियुक्त किया गया था और वे तब से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे थे। याचिकाकर्ता के अनुसार, राज्य सरकार की विनीयमितीकरण नीति दिनांक 07.10.2016 के तहत आदेश दिनांक 18.08.2017 द्वारा उन्हें 'स्थायी कर्मी' के रूप में वर्गीकृत कर लाभ दिया गया था। मार्च 2024 से याचिकाकर्ता का वेतन रोक दिया गया और बिना कोई औपचारिक बर्खास्तगी आदेश जारी किए उन्हें ड्यूटी पर आने से रोक दिया गया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर वेतन जारी करने और सेवा में बने रहने की मांग की।
एक कर्मचारी की जांच करने गए थे 22 मिले
याचिका के लंबित रहने के दौरान, हाईकोर्ट के आदेश (दिनांक 16.04.2026) के अनुपालन में विभाग की तीन सदस्यीय समिति ने नियुक्तियों की वैधता की जांच की। समिति ने 30 जून 2026 को अपनी रिपोर्ट (Annexure R/1) सौंपी, जिसमें याचिकाकर्ता और उसके जैसे 21 अन्य कर्मचारियों (कुल 22 कर्मचारियों) की नियुक्तियों को अवैध पाया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि इन नियुक्तियों का कोई मूल आदेश विभागीय रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है और न ही निर्धारित भर्ती प्रक्रिया का पालन किया गया था।
जांच रिपोर्ट आने के बाद याचिकाकर्ता ने आवेदन (I.A. No. 12446/2026) दायर कर इस जांच रिपोर्ट/आदेश को भी इसी याचिका में चुनौती देने तथा इसे रद्द करने की मांग की।
संविधान, कानून और नियमों का उल्लेख
याचिकाकर्ता ने रोक गए वेतन के भुगतान और कार्य करने की अनुमति मांगने हेतु हाईकोर्ट के समक्ष रिट याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल की थी।
याचिका संशोधन आवेदन का निपटारा करते हुए कोर्ट ने माना कि यद्यपि अनुच्छेद 226 के तहत रिट कार्यवाही में सीपीसी सख्त रूप से लागू नहीं होती, फिर भी सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 का आदेश VI नियम 17 के सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाता है।
विनीयमितीकरण नीति (दिनांक 07.10.2016): राज्य सरकार की इस नीति का उपयोग दैनिक वेतनभोगी/अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी कर्मी का दर्जा देने के लिए किया जाता है।
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 30.06.2026 की जांच रिपोर्ट प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन कर तैयार की गई है क्योंकि उन्हें पक्ष रखने का प्रभावी अवसर नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ता के वकीलों के तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जितेन्द्र कुमार शर्मा एवं सुश्री क्रांति सचदेव ने कहा कि, याचिकाकर्ता 24 अप्रैल 1993 से लगातार सेवा दे रहा है और 18.08.2017 के आदेश द्वारा उसे शासन की नीति के तहत स्थायी कर्मी का लाभ दिया जा चुका है। याचिकाकर्ता पर सेवा के दौरान किसी भी प्रकार के दुराचरण (misconduct) का कोई आरोप नहीं है। विभाग के कुछ अधिकारियों के खिलाफ लोकायुक्त जांच का याचिकाकर्ता से कोई लेना-देना नहीं है और अधिकारियों की अनियमितताओं के लिए याचिकाकर्ता को बलि का बकरा (scapegoat) नहीं बनाया जा सकता। बिना सुनवाई का अवसर दिए वेतन रोकना और जांच रिपोर्ट पास करना मनमाना व अवैध है। संशोधन आवेदन के समर्थन में याचिकाकर्ता ने डिविजन बेंच के निर्णय जगदीश सिंह जाटव बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (W.A. No. 1389/2026, आदेश दिनांक 05.05.2026) का हवाला दिया।
राज्य सरकार के वकील (शासकीय अधिवक्ता श्री बी.एम. पटेल) के तर्क:
याचिकाकर्ता के पास ऐसा कोई वैध प्रारंभिक नियुक्ति आदेश, चयन रिकॉर्ड या सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति नहीं है जो उसकी नियुक्ति की वैधता साबित कर सके। विभागीय रिकॉर्ड की जांच में पाया गया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति न तो स्वीकृत पद के विरुद्ध हुई थी और न ही इसके लिए कोई चयन प्रक्रिया अपनाई गई थी। तीन सदस्यीय जांच समिति ने रिकॉर्ड खंगालने के बाद 30.06.2026 को निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता सहित सभी 22 कर्मचारियों की नियुक्तियां पूरी तरह अनधिकृत व अवैध हैं। सर्विस बुक केवल एक प्रशासनिक रिकॉर्ड है; यह मूल नियुक्ति आदेश का स्थान नहीं ले सकती।
न्यायालय का विस्तृत विश्लेषण एवं निर्णय
1. संशोधन आवेदन (I.A. No. 12446/2026) पर निर्णय: अदालत ने याचिका में संशोधन की अनुमति देने से इनकार करते हुए आवेदन खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मूल याचिका केवल वेतन जारी करने और काम पर लेने से संबंधित थी। 30.06.2026 की जांच रिपोर्ट को चुनौती देना एक नया और स्वतंत्र विवाद है, जिससे मुकदमे का दायरा पूरी तरह बदल जाएगा और राज्य सरकार को नए सिरे से जवाब दाखिल करना पड़ेगा। कोर्ट ने जगदीश सिंह जाटव मामले को अलग बताते हुए कहा कि उस मामले में संशोधन से केस की प्रकृति नहीं बदल रही थी, जबकि वर्तमान मामले में स्थिति भिन्न है।
2. मुख्य याचिका (W.P. No. 896/2025) पर निर्णय:
अदालत ने याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया और निम्नलिखित बिंदु तय किए:
केवल लंबी अवधि तक काम कर लेने से अवैध नियुक्ति को वैधता नहीं मिल जाती। सेवा की लंबाई काम करने के तथ्य को साबित कर सकती है, लेकिन यह कानूनी अधिकार नहीं बनाती। सर्विस बुक एक प्रशासनिक रिकॉर्ड है। यह मूल नियुक्ति आदेश का विकल्प नहीं बन सकती और न ही अतीत में दिए गए वेतन से किसी अनधिकृत नियुक्ति को कानूनी दर्जा मिलता है। नीति के तहत मिला लाभ केवल उस नियुक्ति पर लागू होता है जो कानूनन सही हो। मूल नियुक्ति अवैध होने पर नीतिगत लाभ स्वतंत्र रूप से नौकरी का अधिकार पैदा नहीं कर सकता।
दुराचरण न होना एक अलग बात है और वैध नियुक्ति का होना अलग बात। यदि नियुक्ति का आधार ही गायब है, तो दुराचरण न होने से कोई राहत नहीं दी जा सकती। जब मूल नियुक्ति ही अवैध पाई गई हो, तो काम न करने की अवधि के लिए वेतन का भुगतान करने हेतु परमादेश (Mandamus) जारी नहीं किया जा सकता।
न्यायालय की विशिष्ट टिप्पणियां
न्यायालय ने अपने आदेश में लोक सेवाओं में नियुक्तियों की कानूनी मर्यादा को रेखांकित करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
"लंबी सेवा से उत्पन्न होने वाले समतामूलक विचार (Equitable considerations) इस आवश्यकता को समाप्त नहीं कर सकते कि सार्वजनिक सेवा में नियुक्ति की एक कानूनी नींव (lawful foundation) होनी चाहिए।"
"सार्वजनिक रोजगार केवल इस आधार पर जारी नहीं रखा जा सकता कि कोई कर्मचारी लंबे समय तक सेवा में रहा है, यदि नियुक्ति स्वयं निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत पाई गई हो।"
"दुराचरण का न होना एक अलग विषय है और वैध नियुक्ति का अस्तित्व होना बिल्कुल अलग विषय है। जहां नियुक्ति की नींव ही गायब हो, वहां केवल दुराचरण न होने के आधार पर सेवा में बनाए रखने का प्रश्न ही नहीं उठता।"
निष्कर्ष एवं आगे का कानूनी विकल्प
हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह राहत व स्वतंत्रता दी कि इस याचिका के खारिज होने या संशोधन आवेदन के अस्वीकार होने से याचिकाकर्ता पर 30 जून 2026 की जांच रिपोर्ट/आदेश के खिलाफ कानून के अनुसार नई याचिका (Fresh Petition) दायर करने पर कोई रोक नहीं रहेगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल याचिकाकर्ता के रिकॉर्ड के आधार पर दिया गया है और इससे उन अन्य कर्मचारियों के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जो इस कोर्ट के समक्ष पक्षकार नहीं हैं।
