गणेश चतुर्थी और कलश स्थापना की शास्त्रसम्मत विधि: कल्याण ही कल्याण होगा

Updesh Awasthee
गणेश चतुर्थी का पर्व विघ्नहर्ता के स्वागत और उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने का पावन अवसर है। जो लोग श्रद्धा और भक्ति के साथ श्री गणेश प्रतिमा और कलश की स्थापना करते हैं उनके समक्ष कई प्रश्न होते हैं। कलश कहां पर रखें, कलश के ऊपर श्रीफल कैसे रखें, श्री गणेश प्रतिमा का मुख किस दिशा में होना चाहिए। कलश के अंदर केवल जल होना चाहिए या कुछ और भी होना चाहिए। श्री गणेश प्रतिमा की सूंड किस तरफ होनी चाहिए। इत्यादि सभी प्रश्नों के शास्त्रसम्मत उत्तर (अर्थात जैसा शास्त्रों में लिखा है बिल्कुल वैसा ही) यहां उल्लेखित हैं:- 

गणेश चतुर्थी पर कलश स्थापना की सही दिशा और स्थान

गणेश चतुर्थी के दिन पूजा स्थल पर कलश को स्थापित करते समय दिशा और स्थान का ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है:
1. कलश का स्थान: कलश को हमेशा भगवान श्री गणेश की प्रतिमा के दाईं ओर (यानी पूजा करने वाले साधक के बाएं हाथ की तरफ) स्थापित किया जाता है।
2. अष्टदल कमल: कलश रखने के स्थान को साफ करके कच्चे चावल से आठ पंखुड़ियों वाला अष्टदल कमल बनाएं और उसी के ऊपर कलश को विराजमान करें।

कलश पर नारियल रखने का सही नियम और शास्त्र सम्मत दिशा

कलश के ऊपर रखा जाने वाला नारियल केवल एक फल नहीं, बल्कि साक्षात मंगल और समृद्धि का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार नारियल को हमेशा आड़ा (लेटी हुई अवस्था में) रखा जाना चाहिए और उसका मुख हमेशा साधक (पूजा करने वाले व्यक्ति) की तरफ होना चाहिए। नारियल का मुख वह भाग होता है जहाँ से वह पेड़ की शाखा से जुड़ा होता है या जहाँ घने जटा वाले रेशे होते हैं। जहाँ जटा हटाने पर तीन बिंदु दिखाई दें।
शास्त्रों में वर्णित प्रसिद्ध श्लोक:
"अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय, ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृद्ध्यै। प्राचीमुखं वित्त विनाशनाय, तस्मात् शुभं संमुख्यं नारिकेलम्॥"
श्लोक का अर्थ और दिशाओं के प्रभाव:
• अधोमुख (नीचे की तरफ मुख): नारियल का मुंह नीचे की ओर रखने से शत्रुओं में वृद्धि होती है।
• ऊर्ध्वमुख (ऊपर आकाश की ओर सीधा खड़ा): नारियल को सीधा खड़ा रखने से घर के सदस्यों में बीमारियां और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ती हैं।
• प्राचीमुख (पूर्व दिशा की ओर मुख): पूर्व दिशा की तरफ नारियल का मुख रखने से धन-संपत्ति का नाश होता है।
• संमुख्य (साधक की तरफ मुख): नारियल का मुख हमेशा पूजा करने वाले के सामने (आपकी तरफ) होना चाहिए। इसे ही सबसे शुभ, कल्याणकारी और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना गया है।

गणेश पूजन के लिए कलश के जल में रखें ये पवित्र सामग्रियां

कलश का जल साधारण जल न रहकर मंत्रों और पवित्र सामग्रियों से अभिमंत्रित हो जाता है। गणेश चतुर्थी पर कलश के जल में निम्नलिखित वस्तुएं अवश्य डालें:
• दूर्वा (दूब घास): भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है। कलश के जल में दूर्वा डालने से वंश-वृद्धि, आरोग्य और बप्पा की असीम कृपा मिलती है।
• सुपारी: यह भगवान गणेश और माता गौरी का ही स्वरूप मानी जाती है, जो सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करती है।
• तांबे या चांदी का सिक्का: यह देवी लक्ष्मी का प्रतीक है, जिससे घर में धन-धान्य का विस्तार होता है।
• अक्षत (अखंडित चावल): यह पूजा की पूर्णता और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है।
• हल्दी की गांठ और रोली: जल को पवित्र बनाकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।

गणेश चतुर्थी पर कलश स्थापना की चरणबद्ध विधि 

1. कलश की तैयारी: तांबे, पीतल या मिट्टी के कलश पर रोली/चंदन से स्वास्तिक का शुभ चिन्ह बनाएं और उसके गले (कंठ) में कलावा (मौली) बांधें।
2. जल भरना: कलश में शुद्ध जल या गंगाजल भरें और उसमें सुपारी, सिक्का, दूर्वा, अक्षत और हल्दी की गांठ डालें।
3. पंचपल्लव (आम के पत्ते): कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 या 7 पत्ते इस तरह सजाएं कि उनका निचला हिस्सा जल को स्पर्श करे।
4. पूर्णपात्र: पत्तों के ऊपर एक छोटी कटोरी (पात्र) रखें और उसे कच्चे चावल से ऊपर तक भर दें।
5. नारियल स्थापित करना: एक नारियल लें, उस पर लाल कपड़ा या चुनरी लपेटकर मौली बांधें। अब नारियल को चावल से भरी कटोरी पर इस तरह रखें कि उसका मुख आपकी (साधक की) दिशा में हो।

गणेशोत्सव के दौरान ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

• 10 दिनों की स्थापना: यदि आप बप्पा को घर में 3, 5, 7 या 10 दिनों के लिए विराजमान कर रहे हैं, तो कलश को भी पूरे समय उसी स्थान पर स्थापित रहने दें।
• कलश का विसर्जन: अनंत चतुर्दशी या विसर्जन के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा के साथ ही कलश के जल और सामग्री का भी विसर्जन करें।
• अक्षत का उपयोग: कलश के नीचे और कटोरी में रखे चावलों को विसर्जन के बाद पक्षियों को डाल दें या घर के अन्न भंडार में मिला दें।शास्त्र सम्मत विधि और सही नियमों के साथ की गई यह कलश स्थापना आपके घर में गणेश चतुर्थी के पर्व पर सुख, शांति, समृद्धि और विघ्नहर्ता का आशीर्वाद लेकर आती है।

बप्पा की मूर्ति का चयन: सूंड की दिशा का महत्व

जब आप गणेश जी की मूर्ति लेने जाएं, तो उसकी सूंड (Trunk) के झुकाव पर विशेष ध्यान दें।
• बाईं तरफ मुड़ी सूंड (वाममुखी गणेश):पहचान: जब आप बप्पा के सामने खड़े हों, तो उनकी सूंड आपके दाहिने हाथ (बप्पा के बाएं अंग) की तरफ मुड़ी होनी चाहिए।
• महत्व: इन्हें चंद्र नाड़ी से प्रभावित माना जाता है, जो शीतलता और शांति का प्रतीक है।घर के लिए नियम:गृहस्थों के लिए बाईं सूंड वाले गणेश जी सबसे उत्तम और शुभ माने जाते हैं। इनकी पूजा-अर्चना की विधियाँ सरल होती हैं और ये शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
• दाईं तरफ मुड़ी सूंड (दक्षिणामुखी गणेश):पहचान: बप्पा की सूंड आपके बाएं हाथ (बप्पा के दाहिने अंग) की तरफ मुड़ी होती है।
महत्व: इन्हें सूर्य नाड़ी से जुड़ा माना जाता है, जो अत्यंत जागृत और उग्र ऊर्जा का प्रतीक है। 
* सोमवार (14 sep 2026) को पूर्व दिशा में दिशाशूल होने के कारण स्थापना के समय उनका मुख उत्तर या उत्तर पूर्व की ओर रखें।

• घर के लिए नियम: घर में सामान्य पूजा के लिए दक्षिणामुखी गणेश जी को रखने से बचा जाता है. इनकी पूजा में कड़े नियमों और विशेष वैदिक अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होता है, इसलिए ये मंदिरों या मठों के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं. अ
न्य बातें: मूर्ति हमेशा बैठी हुई मुद्रा में लें, मूर्ति खंडित (टूटी हुई) नहीं होनी चाहिए, और उसमें मूषक (चूहा) व मोदक अनिवार्य रूप से बने होने चाहिए। 
प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!