जबलपुर, 12 सितंबर 2026: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावों (Motor Accident Claims) के निपटारे को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नज़ीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) एक कल्याणकारी कानून है, जिसका मूल उद्देश्य दुर्घटना पीड़ितों को त्वरित सामाजिक न्याय और वित्तीय राहत प्रदान करना है। कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तकनीकी नियमों या प्रक्रियात्मक कमियों की आड़ लेकर किसी पीड़ित के मुआवजे के दावे को खारिज करना पूरी तरह से अवैध और न्यायसंगत सिद्धांतों के खिलाफ है।
रामलखन मिश्रा बनाम अंकित गुप्ता एवं अन्य
माननीय न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे की एकल पीठ ने 'रामलखन मिश्रा बनाम अंकित गुप्ता एवं अन्य' (MA No. 4919/2026) के मामले में प्रथम मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), सीधी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पीड़ित की ₹3,15,000 की मुआवजा याचिका को महज़ इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के अनुसार नाबालिग वाहन चालक के अभिभावक (Guardian) की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी।
घटना का पूरा विवरण और मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 5 जुलाई 2018 की सुबह लगभग 11:30 बजे का है। ग्राम अमदड़ (जिला सीधी) निवासी रामलखन मिश्रा अपने गाँव में बाला प्रसाद मिश्रा के घर के पास खड़े थे। उसी दौरान मोटरसाइकिल (पंजीकरण संख्या MP-53-MI-6636) के चालक अंकित गुप्ता (जो उस समय नाबालिग था) ने वाहन को लापरवाही और तेज गति से चलाते हुए रामलखन मिश्रा को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में रामलखन मिश्रा को गंभीर शारीरिक चोटें आईं, जिसके कारण उन्हें खेती-किसानी और दैनिक कार्यों को करने में स्थायी असमर्थता का सामना करना पड़ा। इलाज के भारी खर्च और शारीरिक क्षति से उबरने के लिए उन्होंने 13 मई 2019 को धारा 166, मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत एम.ए.सी.टी. सीधी के समक्ष ₹3,15,000 के मुआवजे का दावा (MACC No. 03/2019) प्रस्तुत किया।
याचिका में पीड़ित ने निम्नलिखित तीन पक्षों को अनावेदक बनाया था:
अंकित गुप्ता (चालक - नाबालिग, जिसे उसके प्राकृतिक संरक्षक/पिता रामविश्वास गुप्ता के माध्यम से पक्षकार बनाया गया)।
रामविश्वास गुप्ता (वाहन स्वामी एवं नाबालिग का पिता)।
यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (बीमा कंपनी)।
ट्रिब्यूनल (MACT सीधी) की चूक
लगभग सात वर्षों तक चले विचारण और चिकित्सा बिल व साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने के बाद, 11 मार्च 2026 को प्रथम एम.ए.सी.टी. सीधी के विद्वान सदस्य (श्री प्रकाश केसर) ने मामले में एक विचित्र रुख अपनाया।ट्रिब्यूनल ने दुर्घटना, लापरवाही, चोटों की गंभीरता और मुआवजे की राशि जैसे मुख्य मुद्दों (Substantive Issues) पर फैसला करने के बजाय केवल मुद्दा नंबर 4 (प्रक्रियात्मक मुद्दा) पर विचार किया। ट्रिब्यूनल ने माना कि चूंकि दुर्घटना के समय चालक (अंकित गुप्ता) नाबालिग था, इसलिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के आदेश 32 (Order 32) के तहत उसके औपचारिक संरक्षक (Guardian) की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी। इस तकनीकी आधार पर ट्रिब्यूनल ने पूरे दावे को खारिज कर दिया और अन्य सभी मुख्य मुद्दों पर "निष्कर्ष अनावश्यक" (Findings Not Necessary) दर्ज कर दिया।
व्यथित होकर दावेदार रामलखन मिश्रा ने अधिवक्ता प्रशांत कुमार सिंह के माध्यम से हाईकोर्ट में धारा 173(1), मोटर वाहन अधिनियम के तहत विविध अपील (M.A. No. 4919/2026) दायर की।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और ट्रिब्यूनल की गलतियों पर प्रहार
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे ने निचले न्यायाधिकरण के आदेश में कई गंभीर कानूनी और प्रक्रियात्मक त्रुटियों को रेखांकित किया:
ट्रिब्यूनल द्वारा Cause Title में छेड़छाड़: हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन कर पाया कि मूल क्लेम याचिका में नाबालिग अंकित गुप्ता के नाम के साथ स्पष्ट रूप से 'संरक्षक/पिता रामविश्वास गुप्ता के माध्यम से' लिखा हुआ था। लेकिन ट्रिब्यूनल ने अपना फैसला तैयार करते समय इस हिस्से को हटा दिया और फिर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि नाबालिग का प्रतिनिधित्व सही तरीके से नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि म.प्र. मोटर वाहन नियम, 1994 का नियम 240 न्यायाधिकरणों की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। इस नियम में CPC के जिन प्रावधानों को लागू किया गया है (जैसे आदेश 5, 9, 16, 17, 18, 21, 23), उनमें आदेश 32 (Order 32 CPC) शामिल ही नहीं है। अतः ट्रिब्यूनल का यह मानना कि आदेश 32 का पालन अनिवार्य था, कानूनन गलत था।
हाई कोर्ट ने कहा कि सीपीसी के आदेश 32 नियम 3 (मध्य प्रदेश संशोधन) के तहत यदि किसी नाबालिग पक्षकार के संरक्षक की नियुक्ति आवश्यक भी हो, तो यह अदालत का प्राथमिक कर्तव्य है कि वह स्वतः (Suo Motu) कदम उठाकर संरक्षक नियुक्त करे। किसी पीड़ित पर इसका बोझ डालकर उसका क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता।
2019 में याचिका दायर करते समय अंकित गुप्ता नाबालिग था, लेकिन 11 मार्च 2026 को जब ट्रिब्यूनल ने आदेश पारित किया, तब तक वह वयस्क (Major) हो चुका था। ट्रिब्यूनल को इस स्थिति का संज्ञान लेना चाहिए था, न कि एक बालिग हो चुके व्यक्ति के लिए गार्जियन न होने का बहाना बनाकर मुकदमा खारिज करना चाहिए था।
Substantive Issues Undecided:
म .प्र. मोटर वाहन नियम, 1994 के नियम 238 के अनुसार न्यायाधिकरण को सभी मुद्दों पर निष्कर्ष दर्ज करना अनिवार्य है। ट्रिब्यूनल ने मुख्य पहलुओं (लापरवाही, मुआवजा राशि और बीमा कंपनी की देनदारी) पर निर्णय न देकर गंभीर कानूनी त्रुटि की।
मोटर दुर्घटना दावे से संबंधित लैंडमार्क जजमेंट्स (संदर्भ में लिए गए )
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय को सुदृढ़ करने के लिए उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया:
यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम शीला दत्ता एवं अन्य (2011) 10 SCC 509:
सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल के समक्ष कार्यवाही कोई पारंपरिक दीवानी मुकदमा (Adversarial Civil Suit) नहीं है, बल्कि यह अधिनियम के अध्याय XII द्वारा संचालित एक वैधानिक जाँच (Statutory Inquiry) है।
विमला देवी एवं अन्य बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2019) 2 SCC 186:
सिद्धांत: मोटर वाहन अधिनियम एक पीड़ित-हितैषी (Beneficial Legislation) कानून है, जो पीड़ितों को दीवानी मुकदमों की कठोर प्रक्रियात्मक जटिलताओं से राहत देने के लिए बनाया गया है।
रजो देवी एवं अन्य बनाम मंजीत कौर एवं अन्य (2025 INSC 741):
सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः दोहराया कि दुर्घटना मामलों में प्रक्रियाओं की कठोरता को न्याय के उद्देश्य पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।
सरजूभाई कांतिलाल पटेल एवं अन्य बनाम भीखूभाई मगनभाई पटेल (2000 SCC OnLine Guj 536):
सिद्धांत: गुजरात हाईकोर्ट ने तय किया था कि यदि नाबालिग का प्रतिनिधित्व उसके माता-पिता या प्राकृतिक संरक्षक द्वारा किया जा रहा है, तो औपचारिक संरक्षक नियुक्ति आदेश का न होना मुकदमे के लिए घातक (Fatal) नहीं होता।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला और निर्देश
माननीय हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के दृष्टिकोण को न्यायसंगत प्रक्रिया के विपरीत माना और निम्नलिखित आदेश पारित किया:
फर्स्ट एम.ए.सी.टी. सीधी द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और अवार्ड दिनांक 11 मार्च 2026 को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया गया।
क्लेम याचिका (MACC No. 03/2019) को उसके मूल नंबर और स्थिति में बहाल किया गया।
मामले को पुनः नए सिरे से कानून के अनुसार निर्णय हेतु एम.ए.सी.टी. सीधी को वापस भेज दिया गया।
चूंकि मामला 2019 से लंबित है, इसलिए ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया गया कि वह 6 महीने की अवधि के भीतर याचिका का निस्तारण करे।
सभी पक्षकारों को 23 सितंबर 2026 को क्लेम ट्रिब्यूनल सीधी के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया गया।
इस निर्णय का लीगल वैल्यू एवं सामाजिक महत्व
यह निर्णय मोटर दुर्घटना दावों के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल प्रस्तुत करता है। निर्णय स्पष्ट करता है कि तकनीकी प्रक्रियाएँ न्याय का मार्ग प्रशस्त करने के लिए हैं, उसे अवरुद्ध करने के लिए नहीं। बीमा कंपनियों या अनावेदकों द्वारा उठाई जाने वाली प्रक्रियात्मक आपत्तियों के आधार पर निचली अदालतें अब दावों को सरसरी तौर पर खारिज नहीं कर पाएंगी। अदालतों को याद दिलाया गया है कि कल्याणकारी कानूनों के तहत अपनी भूमिका केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि सक्रिय न्यायप्रदाता की होनी चाहिए। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (लीगल एडवाइजर एवं पत्रकार)।

