बिजली के मनमाने बिलों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, उपभोक्ता के अधिकार पढ़िए

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026:
बिजली के मनमाने बिल, पूरे भारत की समस्या है। कई बार तो बिजली का बिल, आकाशीय वज्रपात की तरह गिरता है। उपभोक्ताओं को लाखों रुपए का बकाया बिल, अचानक दे दिए जाने के मामले में सामने आते हैं। यदि कोई उपभोक्ता विरोध करता है तो उसको विद्युत अधिनियम, 2003 का डर दिखाया जाता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के लेटेस्ट ऐतिहासिक फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि यही अधिनियम उपभोक्ताओं की रक्षा भी करता है। 

यह महत्वपूर्ण निर्णय न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी (S.V.N. Bhatti) और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया (N.V. Anjaria) की पीठ ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लि. बनाम विद्युत लोकपाल, उ.प्र. एवं अन्य (Civil Appeal No. 5099 of 2013) के मामले में सुनाया। 

मामले का पूरा घटनाक्रम: 1997 से शुरू हुआ विवाद

उत्तर प्रदेश के एक उपभोक्ता (रेस्पोंडेंट नं. 3) ने 4000 KVA लोड के बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया था। तत्कालीन सीमाओं के कारण, दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम (अपीलकर्ता) ने 24 फरवरी 1997 को केवल 2000 KVA लोड स्वीकृत करने का समझौता (Agreement) किया। 31 जनवरी 1998 को निगम ने उपभोक्ता को पत्र भेजकर अतिरिक्त 2000 KVA लोड लेने का प्रस्ताव दिया। लेकिन उपभोक्ता ने 14 सितंबर 1998 को पत्र लिखकर अतिरिक्त लोड लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

9 साल बाद ₹57.74 लाख की मांग 

न तो उपभोक्ता ने अतिरिक्त लोड स्वीकार किया और न ही निगम ने 2000 KVA की अतिरिक्त आपूर्ति जारी की। इसके बावजूद, 13 फरवरी 2007 को निगम ने उपभोक्ता को फरवरी 1998 से सितंबर 1998 की अवधि का अतिरिक्त 2000 KVA लोड पर ₹57,74,164/- का न्यूनतम उपभोग गारंटी शुल्क (MCGC) का बिल थमा दिया। 

कानूनी लड़ाई: CGRF से उच्च न्यायालय तक

उपभोक्ता ने इस मांग को उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम (CGRF) में चुनौती दी, जहाँ खंडित फैसला (split verdict) आया और उपभोक्ता को राहत नहीं मिली। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) के 'विनियम 2007' के विनियम 8.1 के तहत उपभोक्ता ने विद्युत लोकपाल के समक्ष अपील की। विद्युत लोकपाल ने 13 फरवरी 2007 की ₹57.74 लाख की मांग को रद्द कर दिया और फैसला दिया कि उपभोक्ता ने अतिरिक्त लोड पर सहमति नहीं दी थी। लोकपाल ने निगम को आदेश दिया कि उपभोक्ता द्वारा जमा कराई गई राशि को उसके भविष्य के बिलों में समायोजित किया जाए। विद्युत लोकपाल के आदेश के खिलाफ निगम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) में रिट याचिका (Misc. Single No. 4237 of 2008) दायर की। उच्च न्यायालय ने 6 जनवरी 2012 के अपने आदेश में निगम की याचिका खारिज कर दी। उच्च न्यायालय के प्रमुख बिंदु थे:
  • उपभोक्ता की देनदारी केवल तब उत्पन्न होती है जब स्वीकृत बिजली वास्तव में उसे जारी की जाए।
  • UPERC विनियम, 2007 के क्लॉज 8.1 और 8.2 विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 42(6) के विपरीत एवं अल्ट्रा वायर्स (ultra vires) हैं, क्योंकि यह अधिनियम वितरण लाइसेंसधारी (कंपनी) को लोकपाल के समक्ष जाने का अधिकार नहीं देता।
  • यह मांग विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 56(2), सीमा अधिनियम, 1963 (3 वर्ष की सीमा) तथा उत्तर प्रदेश सरकारी विद्युत उपक्रम (बकाया वसूली) अधिनियम, 1958 की धारा 5-ए (6 वर्ष की सीमा) के तहत समय-बाधित (barred by limitation) है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और लैंडमार्क फैसलों का संदर्भ

उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम ने सर्वोच्च न्यायालय में सिविल अपील दायर की। निगम की ओर से रिकॉर्ड पर वकील श्री राकेश उत्तमचंद्र उपाध्याय (Mr. Rakesh Uttamchandra Upadhyay) उपस्थित हुए। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांतों और लैंडमार्क फैसलों का उल्लेख किया:
K C Ninan v. Kerala State Electricity Board & Ors. (2023 INSC 560): 
इस निर्णय के आलोक में नियम-विनियमों पर निगम की अन्य सहायक दलीलें निष्प्रभावी हो गईं।
Assistant Engineer (D1), Ajmer Vidyut Vitran Nigam Limited and Another v. Rahamatullah Khan Alias Rahamjulla ((2020) 4 SCC 650):
शीर्ष अदालत ने इस लैंडमार्क फैसले को उद्धृत करते हुए कहा कि बिजली शुल्क का भुगतान करने का दायित्व बिजली की खपत पर उत्पन्न होता है और बकाया तब "पहली बार देय" (first due) बनता है जब कंपनी बिल जारी करती है।
विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 56(2) के तहत कंपनी को बकाया न चुकाने पर बिजली कनेक्शन काटने का वैधानिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार 2 साल की समय-सीमा के अधीन है। यदि किसी राशि को पिछले बिलों में लगातार बकाया के रूप में नहीं दिखाया गया है, तो 2 वर्ष बीत जाने के बाद धारा 56(2) के तहत ऐसी मांग उठाकर बिजली काटना या दबाव बनाना कानूनन गलत है।

अदालत का अंतिम निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 1998 की अवधि का बिल पहली बार 13 फरवरी 2007 को भेजा गया था, जो कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 56(2) के तहत समय-बाधित है। इसके अलावा, जब अतिरिक्त बिजली आपूर्ति जारी ही नहीं की गई थी, तो उपभोक्ता पर उसकी देनदारी आयत नहीं की जा सकती। इन आधारों पर शीर्ष अदालत ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम की अपील खारिज कर दी। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (पत्रकार एवं लीगल एडवाइजर)।

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