नई दिल्ली, 10 अगस्त 2026: देश की सर्वोच्च अदालत ने लापता व्यक्तियों के मामले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह (Justice Ahsanuddin Amanullah) और जस्टिस आर. महादेवन (Justice R Mahadevan) की पीठ ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी लापता व्यक्ति की सूचना मिलने पर immediate registration of first information reports (FIRs) का निर्देश केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि वयस्कों (adults) के लिए भी समान रूप से लागू होता है। कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि 'व्यक्ति' (person) शब्द की परिभाषा में उम्र या लिंग (age or gender) का कोई बंधन नहीं है। अदालत उन राज्यों के इस तर्क से "स्तब्ध" (shocked) थी कि उन्होंने इस आदेश को केवल बच्चों तक सीमित समझा था, जिसे कोर्ट ने जानबूझकर की गई गलती या 'mala fide bogey' करार दिया।
Detailed case history of G Ganesh v State of Tamil Nadu and missing child legal battle
इस पूरे कानूनी घटनाक्रम की शुरुआत जी. गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य (G Ganesh v. State of Tamil Nadu & Ors) मामले से हुई। यह कहानी साल 2011 की है, जब चेन्नई से जी. गणेश की नाबालिग बेटी लापता हो गई थी। कई एजेंसियों द्वारा जांच किए जाने के बावजूद, पुलिस बच्चे का पता लगाने में असमर्थ रही और अंततः मामले को 'पता न चलने योग्य' (undetectable) बताकर बंद कर दिया गया। जब मद्रास उच्च न्यायालय ने इस क्लोजर रिपोर्ट में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, तब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। मामले की गंभीरता और सिस्टम की खामियों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका के दायरे को बढ़ाते हुए इसे suo motu (स्वत: संज्ञान) में बदल दिया ताकि देश भर में लापता बच्चों और child trafficking (बाल तस्करी) जैसे बड़े मुद्दों पर गौर किया जा सके।
Contempt of court notice to DGP and Chief Secretary for failing to follow Supreme Court guidelines
अदालत ने अपने पिछले 22 मई के आदेश का हवाला देते हुए सख्त चेतावनी दी है। जस्टिस अमानुल्लाह की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई राज्य या केंद्र शासित प्रदेश (UT) इन निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो संबंधित राज्य के Chief Secretary और Director General of Police (DGP) को contempt of court (अदालत की अवमानना) का नोटिस जारी किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर यह बताना होगा कि उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए। विशेष रूप से, लद्दाख (Ladakh) केंद्र शासित प्रदेश द्वारा कोई प्रतिक्रिया न दिए जाने पर कोर्ट ने वहां के मुख्य सचिव और डीजीपी को व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है।
Role of Mukta Gupta committee and integration of missing person portals across India
इस जटिल समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष समिति का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता (Ms. Mukta Gupta) कर रही हैं और वरिष्ठ अधिवक्ता एस.डी. संजय (Mr. S.D. Sanjay) इसके संयोजक (Convenor) के रूप में कार्य कर रहे हैं। कोर्ट को सूचित किया गया कि लापता व्यक्तियों की खोज के लिए देश भर के सभी संबंधित पोर्टलों को एकीकृत (integrate) करने का कार्य अगले 6 हफ्तों के भीतर पूरा किया जाना चाहिए। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे को इस संबंध में संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय करने की जिम्मेदारी दी गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यों को अपनी स्थिति रिपोर्ट (status reports) और की गई कार्रवाई का विवरण हलफनामे के माध्यम से देना अनिवार्य है।
Impact of Supreme Court judgment on tracing missing persons and tackling child trafficking
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख का उद्देश्य tracing missing persons की प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाना है। अदालत ने बार (Bar) के सदस्यों की इस मामले में रुचि की सराहना की और समिति को उनके सुझावों पर विचार करने का निर्देश दिया है । यह मामला अब अगली सुनवाई के लिए 5 अक्टूबर, 2026 को सूचीबद्ध किया गया है। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अब पुलिस किसी भी लापता व्यक्ति, चाहे वह बच्चा हो या बुजुर्ग, की FIR लिखने से मना नहीं कर सकती और लापरवाही बरतने वाले शीर्ष अधिकारियों को सीधे कोर्ट में जवाब देना होगा।

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