अभिजीत दीपके को बालाघाट के पत्रकारों ने खदेड़ा, माफी मांग कर सवालों से भागे - VIRAL VIDEO

Updesh Awasthee
बालाघाट, 12 सितंबर 2026:
इंस्टाग्राम पर कॉकरोच जनता पार्टी पेज के संचालक श्री अभिजीत दीपके को आज मध्य प्रदेश के बालाघाट में पत्रकारों ने खदेड़ दिया। पत्रकारों ने सवालों की ऐसी झड़ी लगाई, अभिजीत दीपके ने पहले तो माफी मांगी और फिर सवालों का जवाब दिए भी नहीं अपनी कार लेकर आगे निकल गए। अभिजीत दीपके स्वयं ड्राइव कर रहे थे। 

अभिजीत दीपके के वीडियो पर लोगों के तीखे कमेंट

सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। श्री विजय सिंह लिखते हैं, जब भी कहीं कोई दुखद हादसा होता है, अभिजीत दीपके अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वहां पहुंच जाते हैं। सोशल एक्टिविस्ट राजेंद्र वर्मा ने लिखा, सवाल बिल्कुल जायज़ है - किसी भी त्रासदी को राजनीतिक मुद्दा बनाने से पहले यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि घटना के इतने समय बाद वहां पहुंचने का उद्देश्य क्या है? सोशल मीडिया एक्टिविस्ट रानी पुरोहित ने लिखा, जनता अब सिर्फ बयान नहीं सुनती, जवाब भी मांगती है। हर घटना को राजनीतिक अवसर समझने वालों को याद रखना चाहिए। इंजीनियर श्री राजेश सिंह का कहना है कि अभिजीत दीपिके इसलिए भागे क्योंकि, उनसे सवाल पूछने वाली उनकी प्रिय मीडिया उनके साथ नहीं थी। इस बार लोकल के पत्रकार थे, जिनको मर्ज भी पता है और उसका इलाज भी पता है। 

यह है बालाघाट का सच 

दरअसल जिस क्षेत्र की बात हो रही है वह पिछले 36 सालों से नक्सलवादियों के कब्जे में था। यहां सरकारी कर्मचारी का प्रवेश करते ही उसको मार दिया जाता था। नक्सलवादी इतनी पावरफुल थे कि उन्होंने कैबिनेट मंत्री की हत्या कर दी थी। इस इलाके के लोग बालाघाट के अस्पताल में और बालाघाट मेडिकल के लोग इस इलाके में नहीं जा पाते थे। गृहमंत्री श्री अमित शाह के संकल्प के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने गृह मंत्रालय की कमान अपने हाथ में लेते हुए मध्य प्रदेश को नक्सलवाद से मुक्त करवाया। पहली बार इस क्षेत्र में मेडिकल सुविधा पहुंच रही हैं। अभी सिर्फ 9 महीने हुए हैं। आप खुद सोचिए, 36 साल की गुलामी से आजाद हुए अशिक्षित लोग, जिनका ब्रेनवाश हो रखा है। जिनको लगता है कि उनके बच्चे को केवल तांत्रिक ही देवता की मदद से बचा सकता है। वह डॉक्टर को देखते ही भाग जाते हैं। क्या सिर्फ 9 महीने में कोई उनका मुख्य धारा में शामिल कर सकता है। अभी तो सरकार की तरफ से प्रयास चल रहा है और प्रयास की सफलता दिखाई भी दे रही है।

इंडिपेंडेंस इंटेलिजेंस एजेंसी गरुड़ आई अपनी रिपोर्ट में लिखती है कि, बालाघाट के आदिवासी इलाकों में जब बच्चे बीमार पड़ते थे, तो लोग डॉक्टर के पास जाने के बजाय तांत्रिकों के चक्कर में पड़कर झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र करवाते थे। इसी अंधविश्वास के चलते कई मासूम बच्चों ने अपनी जान गंवा दी। प्रशासन ने अंधविश्वास के इस जाल को तोड़ा। माता-पिता को समझा-बुझाकर, जरूरत पड़ने पर सख्ती दिखाकर (बच्चों की इलाज के लिए पुलिस का पहरा बिठाना पड़ा) बच्चों को जबरन अस्पतालों में भर्ती कराया। नतीजा यह हुआ कि 1000 से ज्यादा बच्चे सही इलाज पाकर पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं। जहाँ लोग अस्पताल के नाम से डरते थे, वहाँ सरकारी कोशिशों ने एक हजार से ज्यादा घरों के चिराग बुझने से बचा लिए।

जब प्रशासन दिन-रात एक करके बच्चों की जान बचा रहा था और बीमारी पर काबू पा रहा था, तब अभिजीत दीपके आदिवासी बच्चों की मौतों को भुनाकर अपनी राजनीति चमकाने पहुँच गए। स्थानीय जनता ने उनकी इस संवेदनहीन हरकत को पहचान लिया और मौके पर ही उसे आड़े हाथों लेते हुए सीधा सबक सिखा दिया। यहां तक कह दिया कि जो सड़क पर चलकर आप आए हैं, नक्सलवादियों ने वह सड़क भी नहीं बनने दी थी। 

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!