MP OBC आरक्षण अपडेट: पहली बार पर्याप्त प्रतिनिधित्व और आनुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस हुई

Updesh Awasthee
जबलपुर, 29 जुलाई 2026:
मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को दिए गए 27% आरक्षण को लेकर कानूनी लड़ाई एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। 28 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं और सरकार के बीच 'पर्याप्त प्रतिनिधित्व' (Adequate Representation) और 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' (Proportionate Representation) के अर्थ को लेकर विस्तृत बहस हुई। 

मामले की मुख्य पृष्ठभूमि विवाद की जड़ 

मध्य प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 की धारा 4 में किया गया संशोधन है। राज्य सरकार ने 8 मार्च 2019 से ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह वृद्धि बिना किसी ठोस आधार के की गई है, जबकि कुछ का यह भी कहना है कि ओबीसी की आबादी के अनुसार यह आरक्षण और भी अधिक होना चाहिए। 

सुनवाई के प्रमुख बिंदु:

जनसंख्या बनाम आरक्षण की सीमा: कोर्ट में दलील दी गई कि मध्य प्रदेश में एससी (16%) और एसटी (20%) को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि ओबीसी की आबादी राज्य में 27% से अधिक है, तो उन्हें केवल 14% तक सीमित रखना संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 14 और 16) का उल्लंघन है।

50% की सीमा और ईडब्ल्यूएस: 

सुनवाई के दौरान बताया गया कि 10% ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण के जुड़ने के बाद, यदि ओबीसी को 27% दिया जाता है, तो कुल आरक्षण 73% तक पहुंच जाता है। इंदिरा साहनी केस में तय की गई 50% की सीमा को लेकर कोर्ट ने सवाल किए, जिस पर वकीलों ने तमिलनाडु (69% आरक्षण) और अन्य राज्यों के उदाहरण दिए जहां आरक्षण सीमा 50% से अधिक है। 

पर्याप्त प्रतिनिधित्व की परिभाषा: 

बहस का एक बड़ा हिस्सा संविधान के अनुच्छेद 16(4) पर केंद्रित रहा। याचिकाकर्ताओं ने एन.एम. थॉमस और इंदिरा साहनी जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि 'पर्याप्त प्रतिनिधित्व' का आकलन करने के लिए जनसंख्या एक महत्वपूर्ण मानक है। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक प्रशासन में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक लोकतंत्र के उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

ऐतिहासिक आयोगों का हवाला: 

कोर्ट के समक्ष काका कालेलकर आयोग (1955) और मंडल आयोग की सिफारिशों को रखा गया। यह बताया गया कि कालेलकर आयोग ने भी कुछ श्रेणियों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की बात कही थी।

राज्य सरकार का रुख और डेटा का सवाल 

कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या 27% आरक्षण तय करने के लिए कोई क्वांटिफिएबल डेटा (Quantifiable Data) या क्राइटेरिया अपनाया गया था। सरकार की ओर से दलील दी गई कि ओबीसी वर्ग सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा है और उनके उत्थान के लिए यह कदम आवश्यक है। 

अगली कार्रवाई 
सुनवाई के अंत में, कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाते हुए अन्य पक्षों को सुनने का निर्णय लिया है। आगामी थर्सडे और फ्राइडे को वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा विस्तृत बहस की जाएगी। इस मामले में ईडब्ल्यूएस आरक्षण की संवैधानिक स्थिति और इसे वर्टिकल या हॉरिजॉन्टल लागू करने के मुद्दे पर भी कोर्ट विचार कर सकता है।
यह मामला न केवल मध्य प्रदेश की राजनीति बल्कि प्रदेश की सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश की प्रतीक्षा कर रहे हजारों युवाओं के भविष्य के लिए भी निर्णायक साबित होगा।

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