जबलपुर, 30 जुलाई 2026: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर में पिछले तीन दिनों से ओबीसी वर्ग को आबादी के अनुपात (Population Ratio) में आरक्षण और भागीदारी सुनिश्चित करने के मुद्दे पर गहन सुनवाई चल रही है। आज की कार्यवाही दोपहर 1:30 बजे तक चली, जिसमें आरक्षित वर्ग के हितों की पैरवी की गई। कोर्ट के समक्ष यह मुख्य तर्क रखा गया कि ओबीसी वर्ग की 51% आबादी होने के बावजूद उन्हें उचित प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल रहा है। सुनवाई के दौरान सामाजिक और प्रशासनिक पूर्वाग्रह (Prejudice) के मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
Disparity in MP High Court Selection Exam Cut-off Marks for OBC
कोर्ट को अवगत कराया गया कि किस प्रकार हाईकोर्ट चयन परीक्षा 2022-23 के परिणामों में विसंगतियां हैं। रिकॉर्ड के अनुसार, सामान्य (Unreserved) वर्ग का कट-ऑफ अंक 75 था, जबकि OBC कट-ऑफ 88 अंक रहा। इसका अर्थ यह है कि ओबीसी उम्मीदवार सामान्य वर्ग से अधिक अंक प्राप्त करने के बाद भी चयन से वंचित कर दिए गए। याचिकाकर्ताओं ने इसे "Merit" के साथ अन्याय और आरक्षित वर्ग के प्रति एक गहरा पूर्वाग्रह करार दिया।
Evidence from Miller Commission, AIIMS, and Indian Railway Committee Reports
कोर्ट में ऐतिहासिक और वर्तमान रिपोर्टों का हवाला देकर सिस्टमैटिक भेदभाव (Systemic Discrimination) को साबित करने का प्रयास किया गया। बहस के दौरान 1918 की मिलर कमीशन रिपोर्ट का जिक्र हुआ, जिसमें बताया गया था कि कैसे एक ही जाति का उच्च पदों पर 85% से अधिक कब्जा है। इसके अलावा, दिल्ली एम्स (AIIMS) की 2018 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि मेडिकल परीक्षाओं में उच्च जाति के शिक्षकों द्वारा आरक्षित वर्ग के छात्रों को जानबूझकर कम अंक दिए जाते हैं। इसके विपरीत, भारतीय रेलवे की रिपोर्ट पेश की गई जिसमें कहा गया कि आरक्षण के कारण रेलवे को 64% का अप्रत्याशित लाभ हुआ है।
Conflict in Judicial Decisions: Case No 8750/2022 and 542/2021
विधिक तर्कों के दौरान न्यायपालिका के फैसलों में विरोधाभास को भी रेखांकित किया गया। कोर्ट को जस्टिस शील नागू की याचिका क्रमांक 8750/2022 और जस्टिस सुजय पाल की डिवीजन बेंच द्वारा पारित याचिका क्रमांक 542/2021 के फैसलों से अवगत कराया गया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उच्च पदों पर आसीन कुछ अधिकारी और न्यायधीश आरक्षित वर्ग के मामलों में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर काम करते हैं, जिससे न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
MP Government Defense by Senior Advocate KM Nataraj on 27 Percent OBC Quota
दोपहर 2:30 बजे से मध्य प्रदेश सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के.एम. नटराज ने पक्ष रखना शुरू किया। उन्होंने एम.एन. थॉमस (M.N. Thomas) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जनसंख्या ही आरक्षण का प्रमुख आधार होना चाहिए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि ओबीसी की आबादी लगभग 51% है, इसलिए 27% आरक्षण न्यायसंगत है। सरकार ने अपनी दलीलों में अंबेडकर यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का भी उल्लेख किया।
High Court Questions Validity of Mahajan Commission Report 1983
हालाँकि, हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कोर्ट ने विशेष रूप से पूछा कि 2019 में 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने से पहले सरकार ने क्या "Field Work" या नई एक्सरसाइज की थी?सरकार ने महाजन आयोग (Mahajan Commission) की रिपोर्ट को मुख्य आधार माना, जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह 1983 की रिपोर्ट है और अत्यंत पुरानी हो चुकी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2019 के बाद की किसी भी नई रिपोर्ट को आरक्षण बढ़ाने के पूर्व का आधार नहीं माना जा सकता और सरकार के पास फिलहाल इसके अलावा कोई अधिकृत डेटा नहीं है।
निष्कर्ष: आज की बहस शाम 4:35 बजे तक चली । सरकार इस मामले में अपना पक्ष रखना कल यानी 31 जुलाई को सुबह 11:30 बजे से फिर से शुरू करेगी। Madhya Pradesh OBC Reservation latest update के लिए कानूनी विशेषज्ञों की नजरें कल की सुनवाई पर टिकी हैं।

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