विघ्न हरण मंगल करण, श्री गणपति सुमरौं ध्याय। महामाई की कथा कहूँ, भक्ति प्रेम मन लाय॥ विदिशा जनपद मध्य में, बड़ोह ग्राम प्रधान। पश्चिम मुखी सिद्ध ईश्वरी, राखो हमरो ध्यान॥
कथा प्रारंभ
एक समय की बात है, जब पांडव अपना बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास व्यतीत कर रहे थे। मध्यप्रदेश की पावन भूमि पर विचरण करते हुए, वे विदिशा जिले के गंजबासौदा क्षेत्र के अंतर्गत पठारी के निकट बड़ोह नामक सुंदर स्थान पर पहुँचे।
कौरवों पर विजय प्राप्त करने की इच्छा लेकर, पांडवों ने यहाँ माँ भगवती की कठिन आराधना करने का निश्चय किया। शत्रुओं का नाश करने और धर्म की स्थापना हेतु उन्होंने यहाँ बीस भुजा धारी पश्चिम मुखी महामाई की प्रतिमा की स्थापना की। विद्वानों के अनुसार, पश्चिम मुखी माता की प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ और सिद्ध मानी जाती है, जिसकी आराधना से शत्रुओं पर उसी प्रकार विजय प्राप्त होती है जैसे माँ बगलामुखी की कृपा से मिलती है।
चौपाई: पांडव मध्य देश जब आए, मातु चरण में शीश नवाए।
बीस भुजा धारी कल्याणी, स्थापन कीन्ह सकल सुख खानी॥
पश्चिम मुख अति दुर्लभ रूपा, दर्शन करत मिटत भव कूपा।
महाभारत रण जीतन हेतू, पूजी शक्ति विजय की केतू॥
माता का अलौकिक स्वरूप और महिमा
हे भक्तों! माँ महामाई का यह स्वरूप अत्यंत विस्मयकारी है। ऐसी मान्यता है कि महामाई दिन में तीन बार अपना रूप परिवर्तित करती हैं।
प्रातः काल: माँ एक कोमल कन्या के रूप में दर्शन देती हैं।
दोपहर: माँ का स्वरूप तेजस्वी युवावस्था का हो जाता है।
सायंकाल: माँ वृद्ध स्वरूप में भक्तों को दर्शन देकर निहाल करती हैं।
माँ के इन तीन रूपों के दर्शन मात्र से प्राणी को अखंड सौभाग्य और संतान सुख की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं, पश्चिम मुखी माँ के दर्शन का फल शतचंडी महायज्ञ के समान बताया गया है। प्राचीन श्रुतियों में ऐसा उल्लेख है।
दोहा: कन्या, युवती, वृद्धा स्वरूप, धारत माता रूप।
दर्शन फल शतचंडी सम, महिमा अति अनूप॥
सिंह की भक्ति और श्रद्धा
साक्षात वनराज (शेर) प्रतिदिन माँ के दरबार में उपस्थित होता है। वह जोर से दहाड़ कर माता को प्रणाम करता और अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
अष्ट भुजा और बीस भुजा धारी यह माता अपने भक्तों को सभी चिंताओं से मुक्त कर देती हैं। श्री दुर्गा सप्तशती में भी ऐसा उल्लेख है।
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस पांडव कालीन सिद्ध शक्तिपीठ की कथा का श्रवण या पठन करता है, माँ महामाई उसके शत्रुओं का नाश करती हैं और उसे अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
इति श्रीमदाचार्योपदेशावस्थिविरचिता श्रीमहामायीमहिमाकथा सम्पूर्णा।
श्रीमातृचरणारविन्दार्पणमस्तु॥
उद्घोषणा: प्राचीन श्रुतियों में यह उल्लेख भी मिलता है कि, म्लेच्छों के आक्रमण के समय इस दिव्य प्रतिमा को एक जल संरचना के नीचे छुपा दिया गया था। श्रुतियों में यह उल्लेख नहीं मिलता है कि, महामाई की उस दिव्य प्रतिमा को फिर कभी जल संरचना से बाहर निकल गया है या नहीं। अनुमान है के महामाई की दिव्या प्रतिमा आज भी किसी जल संरचना के नीचे विराजमान है।

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