ग्वालियर, 29 जून 2026: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने Criminal Reference No. 01 of 2024 के एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कोई भी आरोपी अपनी शारीरिक अक्षमता का झूठा नाटक करके कानून की पकड़ से नहीं बच सकता। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव की पीठ ने ग्वालियर के विशेष न्यायाधीश (POCSO) द्वारा भेजे गए एक संदर्भ (Reference) पर सुनवाई करते हुए आरोपी के 'बहरा और गूंगा' होने के दावों को संदिग्ध पाया। कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने सात साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध के बाद सजा से बचने के लिए खुद को गूंगा-बहरा साबित कर रही की कोशिश की।
POCSO Act Case Gwalior: Legal Implications of Deaf and Dumb Accused Faking in Court
यह मामला ग्वालियर के थाटीपुर थाने में दर्ज अपराध (Crime No. 488/2022) से जुड़ा है, जहाँ आरोपी पर IPC की धारा 449, 376(AB), 506 और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप लगाए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी तो मान लिया था, लेकिन आरोपी ने यह दावा किया कि वह बहरा और गूंगा (Deaf & Dumb) है और कोर्ट की कार्यवाही समझने में पूरी तरह असमर्थ है। इसके बाद मामला Section 318 of CrPC के तहत हाई कोर्ट को रेफर किया गया, जो तब लागू होता है जब आरोपी पागल न हो, लेकिन कार्यवाही समझने में सक्षम न हो।
Medical Report Analysis of Malingering Accused in Madhya Pradesh High Court
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय ने आरोपी के झूठ की पोल खोल दी। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में आरोपी के लिए 'Malingering' शब्द का इस्तेमाल किया, जिसका अर्थ है सजा या जिम्मेदारी से बचने के लिए बीमारी का बहाना बनाना। AIIMS भोपाल की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी पूरी तरह बहरा नहीं है और हियरिंग एड (Hearing Aid) की मदद से बातचीत समझ सकता है, लेकिन उसने जांच के दौरान जानबूझकर सहयोग नहीं किया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने गिरफ्तारी मेमो और कोर्ट की अन्य फाइलों पर हिंदी में हस्ताक्षर (Signature) किए थे, जो दर्शाता है कि वह कार्यवाही समझने में सक्षम था।
Previous Criminal Antecedents and Conviction Records of Kalyan Raikwar
अदालत को जांच में पता चला कि आरोपी कल्याण रायकवार का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी रहा है। साल 2013 में भी उसे एक 14 वर्षीय विकलांग बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई थी। चौंकाने वाली बात यह है कि उस समय के ट्रायल के दौरान उसने कभी भी 'बहरा या गूंगा' होने का दावा नहीं किया था और धारा 313 CrPC के तहत अपना बयान भी दर्ज कराया था। हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी ने अपनी पिछली सजा की जानकारी छिपाई और वर्तमान ट्रायल में 'Faking physical deformity' (शारीरिक विकृति का नाटक) का सहारा लिया ताकि उसे सजा में रियायत मिल सके।
Compliance of Section 313 CrPC in Criminal Trials involving Disabled Persons
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा बिना आरोपी का बयान (Section 313 statement) दर्ज किए सीधे सजा सुनाने के फैसले को संशोधित कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आरोपी का बयान धारा 313 CrPC के तहत दर्ज करना अनिवार्य है, भले ही इसके लिए लिखित माध्यम (Written Examination) या साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट की मदद लेनी पड़े। हाई कोर्ट ने साफ़ किया कि Victim's rights (पीड़िता के अधिकार) और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के बीच संतुलन जरूरी है। अब ट्रायल कोर्ट को चार महीने के भीतर आरोपी का बयान दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया पूरी करने और फैसला सुनाने का आदेश दिया गया है।

.webp)