नई दिल्ली, 11 जून 2026: सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत हुआ M. R. Vasumathi vs. The Authorized Officer & Ors. मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं था बल्कि अपनी विरासत को बचाने के लिए एक पुत्री का 16 साल लंबे संघर्ष की कहानी थी। सुप्रीम कोर्ट ने पहलू को ध्यान में रखते हुए न्याय किया और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए बैंक द्वारा नीलाम कर दी गई संपत्ति को वापस करवा दिया।
एम आर वसुमति बनाम इंडियन बैंक मामला: 1984 के ऋण से शुरू हुआ कानूनी विवाद
Background of the Legal Dispute: इस मामले की शुरुआत वर्ष 1984 में हुई थी, जब एस. मुरुगेसन (S. Murugesan), जो 'मैसर्स शिव शंकर एजेंसीज' के प्रोपराइटर थे, ने बैंक से वित्तीय सहायता ली थी। इस ऋण के लिए जी. रामानुजम (G. Ramanujam) गारंटर बने और उन्होंने चेन्नई स्थित अपनी अचल संपत्ति को बंधक (Mortgage) रखा। कर्ज न चुका पाने के कारण 1997 में एक प्रारंभिक डिक्री पारित की गई। गारंटर रामानुजम की मृत्यु 2001 में हो गई। बैंक ने डिक्री के लगभग 12 साल बाद 2009 में SARFAESI अधिनियम, 2002 के तहत कार्रवाई शुरू की और 11 मार्च 2010 को इस संपत्ति की नीलामी कर दी।
SARFAESI नियम 9(4) का उल्लंघन और नीलामी में प्रक्रियात्मक खामियां
Arguments of Appellant M.R. Vasumathi: अपीलकर्ता एम. आर. वसुमति (दिवंगत गारंटर की बेटी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रत्नाकर दास ने दलील दी कि नीलामी की पूरी प्रक्रिया अवैध थी। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
नियम 9(3) का उल्लंघन: नीलामी के दिन 25% राशि "तुरंत" जमा नहीं की गई थी।
नियम 9(4) का उल्लंघन: शेष 75% राशि नीलामी की पुष्टि के 15 दिनों के भीतर जमा की जानी चाहिए थी। इस मामले में 15 दिन की अवधि 26 मार्च 2010 को समाप्त हो गई थी, जबकि भुगतान 31 मार्च 2010 को किया गया।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि भुगतान में देरी के विस्तार के लिए बैंक और क्रेता के बीच कोई लिखित समझौता (Written Agreement) नहीं था, जैसा कि कानूनन अनिवार्य है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बैंक ने अधिकारियों के बजाय मूल कर्जदार से मूल्यांकन रिपोर्ट (Valuation Report) प्राप्त कर नियम 8(5) का उल्लंघन किया।
बैंक और नीलामी क्रेता का पक्ष: नीलामी में पारदर्शिता और 'फोराम नॉन कन्वीनियन्स' का तर्क
Arguments of Indian Bank and Auction Purchaser: बैंक के वकील बृजेश कुमार तांबर ने तर्क दिया कि नीलामी पारदर्शी थी और नीलामी क्रेता (Auction Purchaser) ने 2.11 करोड़ रुपये की उच्चतम बोली लगाई थी, जो आरक्षित मूल्य से काफी अधिक थी। बैंक का कहना था कि मामूली देरी को माफ करना बैंक के अधिकार क्षेत्र में है।
वहीं नीलामी क्रेता के वरिष्ठ अधिवक्ता सौम्य चक्रवर्ती ने तर्क दिया कि वह एक 'बोनाफाइड परचेजर' (Bona fide purchaser) हैं और 16 साल बाद नीलामी रद्द करना उनके लिए विनाशकारी होगा, क्योंकि उन्होंने इतने लंबे समय तक संपत्ति के उपयोग का सुख नहीं लिया है।
Legal Analysis of Mandatory Compliance of SARFAESI Rule 9
उच्चतम न्यायालय ने अपने विश्लेषण में कहा कि SARFAESI नियम, 2002 के नियम 9(3), 9(4) और 9(5) केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि ये अनिवार्य (Mandatory) हैं। न्यायालय ने 'श्री सिद्धेश्वर को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम इकबाल' मामले का हवाला देते हुए कहा कि यद्यपि इन प्रावधानों को पार्टियों द्वारा छोड़ा (Waive) जा सकता है, लेकिन उसके लिए लिखित सहमति आवश्यक है। वर्तमान मामले में, 75% राशि का भुगतान वैधानिक 15 दिनों के बाद किया गया था और बैंक के पास कोई भी ऐसा दस्तावेज़ नहीं था जो समय विस्तार के लिए लिखित समझौते को साबित कर सके।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: नीलामी रद्द, क्रेता को रिफंड और अपीलकर्ता को संपत्ति छुड़ाने का मौका
The Final Verdict and Restitution: न्यायालय ने अपने निष्कर्ष में मद्रास उच्च न्यायालय और ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT/DRAT) के पिछले आदेशों को रद्द कर दिया और नीलामी को अवैध घोषित कर दिया। हालांकि, समानता को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
क्रेता को रिफंड: नीलामी क्रेता को उसकी पूरी जमा राशि पर 7% प्रति वर्ष ब्याज के साथ रिफंड दिया जाएगा।
Right of Redemption: न्यायालय ने एम. आर. वसुमति को बंधक संपत्ति को छुड़ाने का एक अंतिम अवसर दिया।
भुगतान की शर्त: अपीलकर्ता को बैंक के नोटिस के अनुसार 95,42,372.52 रुपये की बकाया राशि पर 5% वार्षिक ब्याज (नोटिस की तारीख से) के साथ भुगतान करना होगा।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अपीलकर्ता निर्धारित समय के भीतर भुगतान करने में विफल रहती है, तो वह संपत्ति पर अपने सभी अधिकार खो देगी और बैंक नए सिरे से नीलामी करने के लिए स्वतंत्र होगा।
यह फैसला भविष्य के लिए नजीर है कि बैंकों को वित्तीय संपत्तियों की वसूली के दौरान compliance of Rule 9 SARFAESI Rules को अत्यंत गंभीरता से लेना चाहिए, अन्यथा लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद भी परिणाम शून्य हो सकते हैं।

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