अयोध्या बायपास चौड़ीकरण के कारण नॉर्थ भोपाल का वाटर लेवल नीचे चला जाएगा: डॉ. कुमारी रोहिणी

Updesh Awasthee
भोपाल, 9 जून 2026
: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की महत्वाकांक्षी अयोध्या बायपास चौड़ीकरण परियोजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। जहाँ एक ओर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना को मंजूरी देते हुए विकास का मार्ग प्रशस्त कर दिया है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों द्वारा मीडिया के माध्यम से उठाई जा रही आपत्तियां एक नई बहस को जन्म दे रही हैं। डॉ. कुमारी रोहिणी द्वारा 'इंडिया वाटर पोर्टल' पर प्रकाशित हालिया रिपोर्ट इस विवाद के उन पहलुओं को उजागर करती है जो केवल कानूनी नहीं, बल्कि पारिस्थितिक हैं।

न्यायालय का निर्णय और विकास का पक्ष 

परियोजना से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि यातायात के बढ़ते दबाव और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण अपरिहार्य है। NGT ने इस परियोजना के तहत लगभग 7,871 पेड़ों को काटने की अनुमति प्रदान की है। हालांकि, इसके बदले में न्यायालय ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे 80,000 नए पौधे लगाएं और अगले 15 वर्षों तक उनकी निगरानी सुनिश्चित करें। प्रशासन का मानना है कि यह संतुलन विकास और पर्यावरण दोनों की रक्षा करेगा।

न्यायालय के फैसले के बाद मीडिया में क्यों हैं दलीलें? 

सवाल यह उठता है कि जब न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया है, तो कार्यकर्ताओं द्वारा मीडिया में अपनी बात रखने की क्या आवश्यकता है? विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं के अनुसार, उनकी चिंता केवल 'पेड़ों की संख्या' तक सीमित नहीं है, बल्कि उस 'जल-तंत्र' से जुड़ी है जिसे न्यायालय के आदेशानुसार किया जाने वाला प्रतिपूरक वृक्षारोपण (Compensatory Afforestation) शायद ही बहाल कर पाए।

कार्यकर्ताओं की मुख्य दलीलें निम्नलिखित हैं:
प्रतिपूरक वनीकरण की विफलता: आधिकारिक ऑडिट और कैम्पा (CAMPA) की रिपोर्टें बताती हैं कि कई क्षेत्रों में पौधों की जीवित रहने की दर केवल 40 से 50 प्रतिशत रही है। इसके अतिरिक्त, नए पौधे उन 40 से 80 साल पुराने पेड़ों (सागौन, शीशम, महुआ) की जगह नहीं ले सकते जो जल अवशोषण और मिट्टी की नमी बनाए रखने में सक्षम थे।
हाइड्रोलॉजिकल प्रभाव (Water Impact Assessment): कार्यकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) में जल-प्रणाली पर स्वतंत्र अध्ययन की कमी है। अयोध्या बायपास क्षेत्र भोपाल के उत्तरी जलग्रहण तंत्र का हिस्सा है जो हलाली और बेतवा बेसिन को रिचार्ज करता है। डामर और कंक्रीट के कारण बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय 'रन-ऑफ' बनकर बह जाएगा, जिससे भविष्य में शहर को बेंगलुरु और दिल्ली जैसे जल-संकट का सामना करना पड़ सकता है।

नीतिगत बदलाव की मांग 
पर्यावरण याचिकाकर्ता नितिन सक्सेना और उमाशंकर तिवारी जैसे कार्यकर्ताओं का मीडिया में आने का उद्देश्य संभवतः व्यापक नीतिगत सुधार की मांग करना है। वे एक समर्पित 'वाटर इम्पैक्ट असेसमेंट' (WIA) ढांचे की वकालत कर रहे हैं, ताकि किसी भी निर्माण से पहले उसके प्राकृतिक जल-प्रवाह पर पड़ने वाले असर का गहरा विश्लेषण हो सके।

यद्यपि कानूनी रूप से परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन यह बहस बुनियादी प्रश्न उठाती है: क्या केवल नए पौधे लगाना पुराने पारिस्थितिकी तंत्र की भरपाई कर सकता है? मीडिया में चल रही यह चर्चा यह दर्शाती है कि शहर का भविष्य केवल सड़कों की चौड़ाई से नहीं, बल्कि उस पानी से भी तय होगा जो इन सड़कों के नीचे बहता है। विकास और जल-सुरक्षा के बीच यह संघर्ष भोपाल के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
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